मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव का असर अब भारत की एलपीजी खपत पर भी दिखाई देने लगा है. सप्लाई में आ रही रुकावटों ने घरेलू और व्यावसायिक दोनों उपभोक्ताओं को प्रभावित किया है. इसी कारण मार्च महीने में गैस की कुल खपत में गिरावट दर्ज की गई है.
मार्च में खपत घटी, आंकड़े दे रहे संकेत
आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार मार्च 2026 में एलपीजी की खपत 2.379 मिलियन टन रही, जो पिछले वर्ष के 2.729 मिलियन टन के मुकाबले लगभग 12.8 प्रतिशत कम है. ये गिरावट बाजार में दबाव की स्थिति को दर्शाती है.
घरेलू और बल्क सेगमेंट दोनों प्रभावित
पेट्रोलियम प्लानिंग एंड एनालिसिस सेल (PPAC) के आंकड़ों के मुताबिक, घरेलू उपयोग के लिए गैस की बिक्री में करीब 8.1 प्रतिशत की कमी आई है और यह 2.219 मिलियन टन पर पहुंच गई. वहीं बल्क एलपीजी की बिक्री में भारी गिरावट दर्ज की गई, जिससे कुल मांग पर असर पड़ा है.
हालांकि सरकार का कहना है कि आपूर्ति पर्याप्त है और घरेलू उपभोक्ताओं की जरूरतों को प्राथमिकता दी जा रही है.
सालाना आधार पर मांग में बढ़ोतरी
हालांकि, पूरे वित्तीय वर्ष के आंकड़े अलग तस्वीर पेश करते हैं. वर्षभर में एलपीजी की कुल खपत में लगभग 6 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है और यह 33.212 मिलियन टन तक पहुंच गई. यह दर्शाता है कि लंबी अवधि में गैस की मांग मजबूत बनी हुई है. स्वच्छ ऊर्जा को बढ़ावा देने वाली नीतियों का भी इसमें महत्वपूर्ण योगदान माना जा रहा है.
अन्य ईंधनों की स्थिति
जहां एलपीजी खपत में गिरावट देखी गई, वहीं विमान ईंधन (ATF) की मांग में कोई खास बदलाव नहीं आया. दूसरी ओर पेट्रोल और डीजल की बिक्री में अच्छी वृद्धि दर्ज की गई, जो आर्थिक गतिविधियों में तेजी का संकेत देती है.
अंतरराष्ट्रीय हालात का दबाव
पश्चिम एशिया में जारी तनाव और प्रमुख समुद्री मार्गों पर अनिश्चितता के कारण भारत की ऊर्जा आपूर्ति पर दबाव बढ़ा है. इससे न केवल सप्लाई चेन प्रभावित हुई है, बल्कि बाजार में अस्थिरता भी बढ़ी है.
कीमतों में बढ़ोतरी का असर
अंतरराष्ट्रीय बाजार में गैस की कीमतों में बढ़ोतरी का असर भारत पर भी पड़ा है. महंगी गैस के चलते खपत पर दबाव देखा जा रहा है. हालांकि, कीमतों और मांग के बीच सीधे संबंध को लेकर अभी कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है.


