उत्तराखंड के गढ़वाल मंडल में इस वर्ष अप्रैल के तीसरे सप्ताह तक जंगलों में आग की घटनाओं ने नया रिकॉर्ड बना दिया है। बीते साल की तुलना में अब तक करीब 42 फीसदी अधिक वन क्षेत्र आग की चपेट में आ चुका है, जो पर्यावरण के लिए गंभीर खतरे का संकेत है।
वन विभाग की रिपोर्ट के अनुसार, अब तक कुल 145 वनाग्नि की घटनाएं दर्ज की गई हैं। इनमें 81 घटनाएं आरक्षित जंगलों में और 64 सिविल वनों में सामने आई हैं। इन आग की घटनाओं से करीब 96.08 हेक्टेयर क्षेत्रफल प्रभावित हुआ है।
गढ़वाल मंडल सबसे ज्यादा प्रभावित
वनाग्नि की सबसे अधिक घटनाएं गढ़वाल वृत्त में दर्ज की गई हैं। यहां अकेले 110 घटनाएं सामने आईं, जिनमें 56 आरक्षित और 54 सिविल वनों की घटनाएं शामिल हैं।
बदरीनाथ वन प्रभाग में सबसे ज्यादा 41 घटनाएं रिकॉर्ड की गई हैं, जबकि रुद्रप्रयाग वन प्रभाग में 30 घटनाएं सामने आईं। रुद्रप्रयाग में ही करीब 65 हेक्टेयर जंगल आग की चपेट में आ चुका है।
वायु गुणवत्ता पर पड़ा असर
जंगलों में बढ़ती आग का सीधा असर पर्यावरण और वायु गुणवत्ता पर देखने को मिल रहा है। पहाड़ी क्षेत्रों में भी वायु गुणवत्ता सूचकांक (AQI) चिंताजनक स्तर तक पहुंच गया है, जो आमतौर पर इन इलाकों में साफ हवा के लिए जाना जाता है।
विशेषज्ञों के अनुसार, आग से निकलने वाला धुआं और ब्लैक कार्बन वातावरण में गर्मी को बढ़ा रहा है, जिससे तापमान में और वृद्धि हो रही है।
विशेषज्ञों ने जताई गंभीर चिंता
विशेषज्ञों का मानना है कि अगर समय रहते इन घटनाओं पर नियंत्रण नहीं पाया गया, तो इसका असर न केवल जंगलों और जैव विविधता पर पड़ेगा, बल्कि जलवायु संतुलन भी बिगड़ सकता है।
पिछले साल से तुलना
बीते वर्ष इसी अवधि में वनाग्नि की घटनाएं बेहद कम थीं। आरक्षित और सिविल वनों में मात्र तीन-तीन घटनाएं दर्ज हुई थीं, जबकि इस साल आंकड़ा कई गुना बढ़ गया है।
क्या है खतरा?
- जैव विविधता को भारी नुकसान
- वायु प्रदूषण में बढ़ोतरी
- तापमान में इजाफा
- पहाड़ी पारिस्थितिकी तंत्र पर खतरा
राज्य में बढ़ती वनाग्नि की घटनाओं ने प्रशासन और पर्यावरण विशेषज्ञों की चिंता बढ़ा दी है। अब जरूरत है कि इन घटनाओं पर समय रहते काबू पाने के लिए ठोस और प्रभावी कदम उठाए जाएं


