उत्तराखंड की वादियों में ट्यूबरक्लोसिस यानी ट्यूबरक्लोसिस का खतरा लगातार बढ़ता जा रहा है. यह बीमारी अब राज्य के 4216 गांवों तक फैल चुकी है, जिससे स्वास्थ्य विभाग की चिंता बढ़ गई है. हर साल करीब 28 हजार नए टीबी मरीज सामने आ रहे हैं, जो इस समस्या की गंभीरता को दर्शाता है.
लगातार बढ़ते मामलों को देखते हुए विश्व स्वास्थ्य संगठन और राज्य का स्वास्थ्य विभाग सतर्क हो गया है. टीबी संक्रमण से सबसे ज्यादा प्रभावित जिलों में हरिद्वार, चमोली, पौड़ी, रुद्रप्रयाग, अल्मोड़ा, बागेश्वर, चंपावत, नैनीताल और पिथौरागढ़ शामिल हैं. इन क्षेत्रों को संवेदनशील श्रेणी में रखा गया है, जहां विशेष निगरानी और स्वास्थ्य सेवाओं पर जोर दिया जा रहा है.
स्क्रीनिंग अभियान शुरू
बीमारी पर नियंत्रण पाने के लिए स्वास्थ्य विभाग ने व्यापक स्तर पर स्क्रीनिंग अभियान शुरू किया है. चिह्नित गांवों में 14 वर्ष से अधिक आयु के सभी लोगों की एक्स-रे जांच अनिवार्य की गई है. इस अभियान के तहत केंद्र सरकार ने करीब 14 लाख ग्रामीणों की जांच का लक्ष्य निर्धारित किया है. अब तक लगभग 5 लाख लोगों की स्क्रीनिंग पूरी हो चुकी है, जबकि 10 लाख से अधिक लोगों की जांच अभी बाकी है.
स्क्रीनिंग को तेज करने के लिए राज्य में 33 पोर्टेबल एक्स-रे मशीनें भेजी गई हैं. इसके अलावा 19 नई मशीनें भी जल्द उपलब्ध कराई जाएंगी, जिससे दूरदराज के इलाकों में जांच की सुविधा बेहतर हो सके. खासकर पहाड़ी क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाओं की सीमित पहुंच को देखते हुए यह कदम बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है.
मरीज़ों का हो रहा बेहतर इलाज
एक ओर जहां टीबी के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं, वहीं दूसरी ओर मरीजों के इलाज में भी सुधार देखने को मिल रहा है. राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के तहत करीब 91 प्रतिशत मरीजों को समय पर उपचार मिलने का दावा किया गया है. सरकार की ओर से मरीजों को हर महीने पोषण के लिए 1000 रुपये की आर्थिक सहायता भी दी जा रही है, जिससे उनके स्वास्थ्य में सुधार हो सके.
राज्य के स्वास्थ्य मंत्री सुबोध उनियाल ने बताया कि राष्ट्रीय क्षय रोग उन्मूलन कार्यक्रम के तहत टीबी को खत्म करने के लिए गंभीर प्रयास किए जा रहे हैं. स्क्रीनिंग और उपचार दोनों पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है और इसके सकारात्मक परिणाम सामने आने लगे हैं.
टीबी नियंत्रण के लिए कैसी तैयारी
प्रदेश में टीबी नियंत्रण के लिए मजबूत ढांचा तैयार किया गया है. राज्य में 13 जिला टीबी केंद्र, 98 ब्लॉक स्तर की टीबी यूनिट, 157 सक्रिय जांच केंद्र और 131 आधुनिक जांच मशीनें कार्यरत हैं. इसके अलावा “टीबी मुक्त पंचायत” मॉडल पर भी काम किया जा रहा है, जिसके तहत गांवों को निर्धारित मानकों के आधार पर टीबी मुक्त घोषित करने का लक्ष्य रखा गया है.
विशेषज्ञों का मानना है कि पहाड़ी क्षेत्रों में टीबी के बढ़ते मामलों के पीछे कई कारण हैं. इनमें स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी, कुपोषण, कमजोर रोग प्रतिरोधक क्षमता, शुरुआती लक्षणों को नजरअंदाज करना और समय पर जांच व इलाज न होना प्रमुख हैं.
सरकार और स्वास्थ्य विभाग के प्रयासों के बावजूद चुनौती अभी भी बड़ी है. ऐसे में जागरूकता, समय पर जांच और नियमित उपचार ही इस बीमारी पर काबू पाने का सबसे प्रभावी तरीका माना जा रहा है.


