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उज्जैन में मोहन भागवत ने समझाया ‘धर्म’ और ‘रिलीजन’ का फर्क, बोले- धर्म मुक्त करता है और सभी के कल्याण का मार्ग दिखाता है

Mintwire by Mintwire
18/09/2026
in देश
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उज्जैन में मोहन भागवत ने समझाया ‘धर्म’ और ‘रिलीजन’ का फर्क, बोले- धर्म मुक्त करता है और सभी के कल्याण का मार्ग दिखाता है

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) प्रमुख मोहन भागवत ने शुक्रवार को उज्जैन में आयोजित राष्ट्रीय युवा धर्म संसद में करीब 1,700 Gen-Z प्रतिभागियों को संबोधित किया। इस दौरान उन्होंने भारतीय संदर्भ में ‘धर्म’ की अवधारणा, पश्चिमी ‘रिलीजन’ और धर्मनिरपेक्षता को लेकर अपने विचार रखे।

भागवत ने कहा कि उन्हें खुशी है कि युवा पीढ़ी धर्म जैसे विषय पर चर्चा कर रही है, क्योंकि कुछ लोग इसे केवल बुजुर्गों से जुड़ा विषय मानते हैं।

‘धर्म’ और ‘रिलीजन’ एक-दूसरे के पर्याय नहीं

भागवत ने कहा कि भारतीय परंपरा में ‘धर्म’ की समझ पश्चिमी अवधारणा वाले ‘रिलीजन’ से अलग है। उनके मुताबिक, अंग्रेजी में भारतीय अर्थ वाले ‘धर्म’ के लिए कोई सटीक समानार्थी शब्द नहीं है और ऐतिहासिक रूप से इसे समझाने के लिए ‘रिलीजन’ शब्द का इस्तेमाल किया गया।

उन्होंने ‘धर्म’ को सत्य, करुणा, पवित्रता और आत्म-अनुशासन से जुड़ा बताया। उन्होंने कहा कि उनके अनुसार धर्म व्यक्ति को मुक्ति की ओर ले जाता है, जबकि ‘रिलीजन’ को उसी अर्थ में धर्म का पर्याय नहीं माना जाना चाहिए।

धर्मनिरपेक्षता को लेकर भी रखी बात

भागवत ने कहा कि भारत ने अलग-अलग आस्थाओं के बीच भेदभाव नहीं किया और उनके अनुसार यही भारतीय संदर्भ में ‘पंथ-निरपेक्षता’ की समझ है। उन्होंने पश्चिमी धर्मनिरपेक्षता की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को शासकों और धार्मिक अधिकारियों के बीच संघर्ष से जोड़ा और कहा कि उसे भारतीय संदर्भ में उसी रूप में नहीं देखा जा सकता।

उन्होंने कहा कि भारतीय परंपरा में जीवन के भौतिक और आध्यात्मिक पहलुओं को अलग-अलग देखने के बजाय साथ देखा गया है। हालांकि, दोनों को एक-दूसरे का पर्याय नहीं माना जाना चाहिए।

‘धर्म’ को खोजने से ज्यादा पहचानने और निभाने की बात

भागवत के मुताबिक, धर्म कोई ऐसी चीज नहीं है जिसे बाहर जाकर खोजा जाए। इसे पहचानना और अपने जीवन में उसका पालन करना जरूरी है। उन्होंने धर्म को ऐसे सिद्धांत के रूप में बताया जो ब्रह्मांड को बनाए रखने, सभी की प्रगति और हर जीव तथा वस्तु की प्रकृति के अनुरूप कर्तव्य निर्धारित करने से जुड़ा है।

उन्होंने यह भी कहा कि धर्म केवल धार्मिक ग्रंथों या चर्चाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि व्यक्ति के व्यवहार और उसके रोजमर्रा के आचरण में भी दिखाई देता है।

प्रकृति को नुकसान पहुंचाना ‘अधर्म’ बताया

युवा प्रतिभागियों से संवाद के दौरान भागवत ने धर्म को पर्यावरणीय जिम्मेदारी से भी जोड़ा। उन्होंने कहा कि धर्म को समझने के लिए व्यक्ति को अपने पूर्वाग्रहों से ऊपर उठना चाहिए।

उन्होंने प्रकृति की रक्षा को मनुष्य का कर्तव्य बताते हुए कहा कि जंगलों को नष्ट करना और पर्यावरण को नुकसान पहुंचाना ‘अधर्म’ है।

अपनी परंपरा के साथ दूसरों की पूजा पद्धति का सम्मान

भागवत ने युवाओं से अपनी परंपराओं पर कायम रहते हुए दूसरे लोगों की पूजा-पद्धतियों और आस्थाओं का भी सम्मान करने की बात कही। उन्होंने कहा कि भारतीय परंपरा लोगों को बांटने के बजाय जोड़ने का प्रयास करती है।

उन्होंने यह भी कहा कि भारत की परंपरा अलग विचार रखने वाले या कठिन परिस्थितियों में डालने वाले लोगों की भी मदद करने की भावना रखती है।

Tags: DharmaEnvironmentGen ZIndian Culturemadhya pradesh newsmohan bhagwatReligionRSSSecularismUjjain NewsYuva Dharma Sansad
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