केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद देश की राजनीति में जवाबदेही को लेकर नई चर्चा शुरू हो गई है। सोशल मीडिया पर रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह का एक पुराना बयान भी तेजी से वायरल हो रहा है, जिसमें वह कहते सुनाई देते हैं, “मंत्रियों के त्यागपत्र नहीं होते हैं भैया, ये यूपीए सरकार नहीं है, एनडीए सरकार है।” हालांकि यह बयान पुराने संदर्भ में दिया गया था, लेकिन मौजूदा घटनाक्रम के बाद इसे फिर से शेयर किया जा रहा है।
धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा ऐसे समय आया है, जब पिछले एक महीने से दिल्ली के जंतर-मंतर पर कथित नीट पेपर लीक और परीक्षा प्रणाली में सुधार को लेकर छात्रों का आंदोलन चल रहा था। आंदोलन की अगुवाई कर रही कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) की सबसे बड़ी मांग शिक्षा मंत्री का इस्तीफा थी। सरकार और प्रदर्शनकारियों के बीच कई दौर की बातचीत के बाद आखिरकार प्रधान ने पद छोड़ दिया। इसके बाद एक बार फिर यह सवाल उठने लगा है कि क्या भारत की राजनीति में पहले भी मंत्री इस तरह इस्तीफा देते रहे हैं?
जब इस्तीफा माना जाता था नैतिक जिम्मेदारी
आजादी के शुरुआती वर्षों में मंत्री पद से इस्तीफा देना लोकतांत्रिक जवाबदेही का हिस्सा माना जाता था। किसी बड़े हादसे, नीतिगत मतभेद या गंभीर विवाद की स्थिति में मंत्री नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए पद छोड़ देते थे।
इसकी सबसे बड़ी मिसाल 1956 का अरियालुर रेल हादसा है। हादसे में 150 से अधिक लोगों की मौत के बाद तत्कालीन रेल मंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने बिना किसी बहाने के नैतिक जिम्मेदारी स्वीकार करते हुए इस्तीफा दे दिया। आज भी इसे भारतीय राजनीति में जवाबदेही का सबसे बड़ा उदाहरण माना जाता है।
हादसों और मतभेदों पर भी हुए इस्तीफे
1999 के गैसल रेल हादसे के बाद तत्कालीन रेल मंत्री नीतीश कुमार ने भी पद छोड़ दिया था। वहीं जॉन मथाई, श्यामा प्रसाद मुखर्जी और सी.डी. देशमुख जैसे नेताओं ने सरकार की नीतियों से असहमति के चलते मंत्रिमंडल से इस्तीफा दिया था।
1958 के मूंधड़ा घोटाले के बाद वित्त मंत्री टी.टी. कृष्णमाचारी ने नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए इस्तीफा दिया। वहीं 1987 में वी.पी. सिंह ने भी सरकार के साथ बढ़ते मतभेदों के बीच वित्त मंत्री का पद छोड़ दिया था।
यूपीए सरकार में भी कई मंत्री छोड़ चुके हैं पद
2004 से 2014 के बीच यूपीए सरकार के दौरान भी कई केंद्रीय मंत्रियों को विवादों के बाद इस्तीफा देना पड़ा। इनमें नटवर सिंह, शशि थरूर, पवन कुमार बंसल और अश्विनी कुमार जैसे नाम शामिल हैं। अलग-अलग मामलों में राजनीतिक दबाव, जांच और न्यायिक टिप्पणियों के बाद इन मंत्रियों ने अपने पद छोड़े।
बीजेपी शासन में भी हुए बड़े इस्तीफे
बीजेपी शासन के दौरान भी कई नेताओं ने अलग-अलग परिस्थितियों में पद छोड़ा। गुजरात की तत्कालीन मुख्यमंत्री आनंदीबेन पटेल ने राजनीतिक हालात के बीच इस्तीफा दिया, जबकि कर्नाटक के मुख्यमंत्री बी.एस. येदियुरप्पा ने संगठनात्मक बदलाव के दौरान पद छोड़ा। विदेश राज्य मंत्री एम.जे. अकबर ने #MeToo आरोपों के बाद इस्तीफा दिया, वहीं उत्तराखंड के तत्कालीन मुख्यमंत्री तीरथ सिंह रावत ने संवैधानिक कारणों से पद छोड़ा था।
क्यों चर्चा में है धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा?
धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा इसलिए खास माना जा रहा है क्योंकि इसके पीछे लंबे समय से चल रहे छात्र आंदोलन और बढ़ते राजनीतिक दबाव को अहम वजह माना जा रहा है। जंतर-मंतर पर हजारों छात्र लगातार प्रदर्शन कर रहे थे और विपक्ष भी संसद के भीतर और बाहर इस मुद्दे को लगातार उठा रहा था।
राजनाथ सिंह का पुराना बयान फिर वायरल
इस्तीफे के बाद राजनाथ सिंह का पुराना वीडियो एक बार फिर सोशल मीडिया पर वायरल हो गया है। वीडियो में वह कहते हैं, “मंत्रियों के त्यागपत्र नहीं होते हैं भैया, ये यूपीए सरकार नहीं है, एनडीए सरकार है।” हालांकि यह बयान अलग राजनीतिक संदर्भ में दिया गया था, लेकिन धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद इसे नए सिरे से चर्चा का विषय बनाया जा रहा है।
जवाबदेही पर फिर उठे सवाल
धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे ने एक बार फिर मंत्री स्तर की जवाबदेही को लेकर बहस छेड़ दी है। भारतीय राजनीति का इतिहास बताता है कि अलग-अलग दौर में मंत्री नैतिक जिम्मेदारी, नीतिगत मतभेद, बड़े हादसों और राजनीतिक विवादों के चलते इस्तीफा देते रहे हैं। ऐसे में अब यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या यह इस्तीफा केवल एक राजनीतिक घटना बनकर रह जाएगा या फिर शासन में जवाबदेही को लेकर नई परंपरा की शुरुआत करेगा।


