केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद जंतर-मंतर पर चल रहे आंदोलन में जश्न का माहौल देखने को मिला। कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के संस्थापक अभिजीत दिपके ने मंच से इसे आंदोलन की बड़ी जीत बताया, लेकिन उनके पूरे संबोधन में सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक का कोई जिक्र नहीं हुआ। इसे लेकर अब राजनीतिक और सामाजिक हलकों में चर्चा तेज हो गई है।
दिपके बोले- मुझे हीरो मत बनाइए
प्रदर्शनकारियों को संबोधित करते हुए अभिजीत दिपके ने कहा कि धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा इस बात का सबूत है कि लोकतंत्र में जनता की आवाज सबसे बड़ी होती है। उन्होंने लोगों से अपील की कि उन्हें इस जीत का हीरो न बनाया जाए।
दिपके ने कहा, “मुझे हीरो मत बनाइए। इस देश ने एक व्यक्ति को हीरो बनाने की कीमत चुकाई है। अगर जनता डरे नहीं और झुके नहीं, तो किसी भी मंत्री से इस्तीफा लिया जा सकता है। यही लोकतंत्र की ताकत है।”
हालांकि, उनके भाषण में 26 दिन तक भूख हड़ताल करने वाले सोनम वांगचुक का नाम न आने पर सवाल उठने लगे।
कैसे आंदोलन का बड़ा चेहरा बने सोनम वांगचुक?
जंतर-मंतर पर CJP का प्रदर्शन जून की शुरुआत में शुरू हुआ था। शुरुआती दिनों में आंदोलन में सीमित संख्या में लोग शामिल हो रहे थे। 28 जून को सोनम वांगचुक ने अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल शुरू की, जिसके बाद आंदोलन को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिलने लगी।
जैसे-जैसे उनका अनशन लंबा खिंचता गया और उनकी तबीयत बिगड़ती गई, प्रदर्शन में लोगों की संख्या लगातार बढ़ती गई। बाद में उन्हें दिल्ली से गुरुग्राम के मेदांता अस्पताल में भर्ती कराया गया, लेकिन वहां से भी उन्होंने छात्रों का हौसला बढ़ाया और आंदोलन जारी रखने की अपील की।
20 जुलाई के बाद बदला आंदोलन का स्वरूप
20 जुलाई को ‘चलो संसद’ मार्च के दौरान प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच हुई झड़प के बाद आंदोलन ने और रफ्तार पकड़ ली। सोशल मीडिया पर वायरल हुए वीडियो और पुलिस कार्रवाई के आरोपों के बाद देशभर से छात्रों और युवाओं का समर्थन मिलने लगा। धीरे-धीरे यह आंदोलन सिर्फ CJP तक सीमित नहीं रहा, बल्कि परीक्षा प्रणाली में सुधार और जवाबदेही की व्यापक मांग बन गया।
अनशन खत्म करने पर भी हुई थी बहस
करीब 26 दिन तक भूख हड़ताल करने के बाद सोनम वांगचुक ने केंद्र सरकार से लिखित आश्वासन मिलने पर अपना अनशन समाप्त किया। इसके बाद कुछ लोगों ने उनके फैसले पर सवाल उठाए, क्योंकि उन्होंने उस समय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग को आगे नहीं बढ़ाया था। उनकी पत्नी गीतांजलि आंगमो ने आलोचनाओं का जवाब देते हुए कहा था कि लोगों को वांगचुक के त्याग और उनके स्वास्थ्य की गंभीर स्थिति को भी समझना चाहिए।
CJP ने माना था वांगचुक का बड़ा योगदान
धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे से पहले CJP के प्रवक्ता आशुतोष रांका ने भी कहा था कि सोनम वांगचुक ने पूरे देश को इस आंदोलन से जोड़ा और लोगों को जागरूक किया। उन्होंने कहा था कि आंदोलन अब किसी एक संगठन या व्यक्ति तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह देशभर के छात्रों की आवाज बन चुका है।
जीत के बाद चर्चा का नया मुद्दा
धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के साथ आंदोलन अपनी सबसे बड़ी मांग पूरी करने में सफल रहा। हालांकि, जीत के इस मौके पर अभिजीत दिपके के भाषण में सोनम वांगचुक का नाम न आने से नई बहस शुरू हो गई है। कई लोगों का मानना है कि आंदोलन को राष्ट्रीय स्तर तक पहुंचाने और उसे गति देने में वांगचुक की भूमिका अहम रही, इसलिए उनके योगदान का उल्लेख होना चाहिए था।


