भारत के लिए इस बार का BRICS Summit सिर्फ एक अंतरराष्ट्रीय बैठक नहीं था, बल्कि बदलते वैश्विक समीकरणों के बीच कूटनीति की बड़ी परीक्षा भी था। संगठन के भीतर युद्ध, पश्चिम एशिया के तनाव और अलग-अलग रणनीतिक हितों को देखते हुए सबसे बड़ा सवाल यही था कि क्या BRICS देश किसी साझा मुद्दे पर एक साथ खड़े हो पाएंगे।
विस्तार के बाद BRICS के सामने बढ़ी चुनौती
BRICS के विस्तार ने संगठन के भीतर मतभेदों को भी बढ़ाया है। 2023 तक जहां इसमें पांच देश थे, वहीं 2025 तक सदस्यों की संख्या बढ़कर 11 हो गई। नए सदस्यों के साथ अलग-अलग राजनीतिक, आर्थिक और रणनीतिक हित भी संगठन का हिस्सा बन गए। ऐसे में सभी देशों को किसी साझा मुद्दे पर सहमत कराना पहले से ज्यादा मुश्किल हो गया।
2025 में नहीं बन पाई थी सहमति
इस चुनौती की झलक पहले ही मिल चुकी थी। अप्रैल 2025 में रियो डी जेनेरियो में हुई BRICS विदेश मंत्रियों की बैठक में मध्य पूर्व के मुद्दे पर सदस्य देशों के मतभेद इतने गहरे रहे कि संयुक्त बयान जारी नहीं हो सका था। ऐसे माहौल में दिल्ली समिट के सामने सबसे बड़ी चुनौती BRICS में फिर से सहमति कायम करना थी।
नई दिल्ली डिक्लेरेशन पर बनी सर्वसम्मति
भारत इस चुनौती में काफी हद तक सफल रहा। 12 सितंबर को BRICS नेताओं ने सर्वसम्मति से ‘नई दिल्ली डिक्लेरेशन’ को मंजूरी दी। इसमें युद्ध और भू-राजनीतिक तनाव के अलावा व्यापार, विकास, डिजिटल टेक्नोलॉजी, AI, सप्लाई चेन, वैश्विक शासन में सुधार और विकास के लिए वित्तीय सहयोग जैसे मुद्दों को भी शामिल किया गया।
पहलगाम हमले की निंदा को लेकर भारत की बड़ी सफलता
भारत के लिए इस घोषणा-पत्र की एक अहम उपलब्धि 22 अप्रैल 2025 के पहलगाम आतंकी हमले की निंदा रही। हमले में 26 लोगों की मौत हुई थी। घोषणा-पत्र में आतंकवाद के खिलाफ जीरो टॉलरेंस की बात कही गई और आतंकियों की सीमा-पार आवाजाही, फंडिंग तथा सुरक्षित ठिकानों के खिलाफ कार्रवाई की जरूरत पर जोर दिया गया।
पाकिस्तान का नाम लिए बिना आतंकवाद पर स्पष्ट संदेश
घोषणा-पत्र में पाकिस्तान का नाम नहीं लिया गया, लेकिन पहलगाम हमले को स्पष्ट रूप से आतंकी हमला बताया गया और इसके जिम्मेदार लोगों व उनके समर्थकों को कानून के दायरे में लाने की बात कही गई। चीन के BRICS में शामिल होने और उसके पाकिस्तान के साथ करीबी संबंधों को देखते हुए भारत के लिए इस मुद्दे पर व्यापक सहमति बनाना अहम कूटनीतिक उपलब्धि माना जा सकता है।
ईरान और UAE के बीच बातचीत का मंच बना नई दिल्ली
BRICS के भीतर पश्चिम एशिया का मुद्दा सबसे जटिल विषयों में से एक रहा। संगठन के सदस्य ईरान और UAE के बीच क्षेत्रीय तनाव को लेकर मतभेद हैं। ऐसे में आशंका थी कि दोनों देशों के बीच असहमति का असर पूरे संगठन की कार्यवाही पर पड़ सकता है।
समिट के दौरान ईरान-UAE नेताओं की मुलाकात
दिल्ली में दोनों देशों ने पश्चिम एशिया में तनाव कम करने और संयम बरतने से जुड़े BRICS के रुख का समर्थन किया। समिट के दौरान ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेज़ेश्कियन और UAE के क्राउन प्रिंस शेख खालिद बिन मोहम्मद बिन जायद अल नाहयान की मुलाकात भी हुई। इससे भारत को दोनों देशों के बीच संवाद के लिए मंच उपलब्ध कराने का अवसर मिला।
BRICS को अमेरिका विरोधी मंच बनने से रोकने की कोशिश
भारत के सामने एक और बड़ी चुनौती BRICS को सीधे अमेरिका या पश्चिम विरोधी गुट बनने से रोकना थी। रूस का अमेरिका और पश्चिमी देशों के साथ यूक्रेन युद्ध को लेकर टकराव है, जबकि चीन और अमेरिका के बीच व्यापार, तकनीक और वैश्विक प्रभाव को लेकर प्रतिस्पर्धा जारी है।
ग्लोबल साउथ को बनाया केंद्र में
भारत ने BRICS के एजेंडे को केवल अमेरिका या पश्चिम के विरोध तक सीमित रखने के बजाय ग्लोबल साउथ के मुद्दों पर केंद्रित करने की कोशिश की। नई दिल्ली डिक्लेरेशन में वैश्विक शासन में सुधार, विकासशील देशों की आवाज मजबूत करने और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में अधिक प्रतिनिधित्व की जरूरत पर जोर दिया गया।
IMF और वर्ल्ड बैंक में विकासशील देशों की भूमिका पर जोर
भारत ने IMF और विश्व बैंक जैसे वैश्विक वित्तीय संस्थानों में विकासशील देशों की भूमिका बढ़ाने का समर्थन किया। इसका व्यापक संदेश यह रहा कि भारत किसी एक शक्ति के खिलाफ गुट बनाने के बजाय ऐसी वैश्विक व्यवस्था की पैरवी कर रहा है, जिसमें विकासशील देशों के हितों और आवाज को अधिक महत्व मिले।
तीन दिनों में PM मोदी की 15 अहम द्विपक्षीय बैठकें
BRICS Summit के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कूटनीतिक सक्रियता भी चर्चा में रही। समिट की पूर्व संध्या और अगले दो दिनों को मिलाकर तीन दिनों में प्रधानमंत्री ने विदेशी नेताओं के साथ 15 औपचारिक द्विपक्षीय बैठकें कीं। इन बैठकों के जरिए भारत को अलग-अलग देशों के साथ द्विपक्षीय रिश्तों और अहम अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर सीधे संवाद का अवसर मिला।
मुश्किल अंतरराष्ट्रीय माहौल में बनी सहमति
इस बार BRICS Summit ऐसे समय हुआ जब दुनिया में युद्ध, व्यापारिक तनाव और गहरे भू-राजनीतिक मतभेद मौजूद हैं। इसके बावजूद सदस्य देशों को एक साझा घोषणा-पत्र पर सहमत कराना भारत के लिए महत्वपूर्ण उपलब्धि रही। इससे यह संदेश गया कि BRICS में मतभेद होने के बावजूद सदस्य देश साझा हितों पर साथ आ सकते हैं।
जेफ्री सैक्स ने भारत की कूटनीति की तारीफ की
इंडिया टुडे की रिपोर्ट के मुताबिक, अर्थशास्त्री और कोलंबिया यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर जेफ्री सैक्स ने BRICS Summit को सफल बताया। उन्होंने भारत की मौजूदा कूटनीति की तुलना G20 की अध्यक्षता से करते हुए कहा कि भारत ने अलग-अलग विचार रखने वाले देशों के बीच सहमति बनाने की क्षमता दिखाई है।
भारत की 5 बड़ी कूटनीतिक उपलब्धियां
कुल मिलाकर दिल्ली BRICS Summit में भारत ने पांच अहम मोर्चों पर अपनी कूटनीतिक क्षमता दिखाई—ईरान-UAE के मतभेदों को संवाद में बदलने का मंच देना, BRICS में सर्वसम्मति कायम करना, पहलगाम आतंकी हमले की निंदा पर सहमति बनाना, संगठन को सीधे अमेरिका-विरोधी गुट बनने से रोकना और अलग-अलग हितों वाले सदस्य देशों को एक मंच पर बनाए रखना।
अब चीन की अध्यक्षता में होगी अगली परीक्षा
BRICS के सामने आगे भी कई चुनौतियां बनी रहेंगी। खास तौर पर 2027 में जब संगठन की अध्यक्षता चीन के पास होगी, तब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि नई दिल्ली में बनी सहमति और संगठन की एकजुटता को बीजिंग किस तरह आगे बढ़ाता है।


