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रंग नहीं, राग है कुमाऊंनी होली: जहां त्योहार नहीं, परंपरा गूंजती है

Mintwire by Mintwire
20/02/2026
in उत्तराखंड, राज्य
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Freepik

उत्तराखंड के कुमाऊं अंचल में मनाई जाने वाली कुमाऊंनी होली केवल रंगों का त्योहार नहीं है, बल्कि यह पहाड़ों की जीवनशैली, भावनाओं और सामूहिक संस्कृति का प्रतीक है. यह उत्सव जल्दबाजी में नहीं मनाया जाता, बल्कि ठहरकर, सुरों और परंपराओं के साथ जिया जाता है. जहां मैदानी इलाकों में होली एक-दो दिनों में समाप्त हो जाती है, वहीं कुमाऊं में यह कई हफ्तों तक चलने वाला सांस्कृतिक आयोजन बन जाती है.

बसंत पंचमी से होती है शुरुआत

कुमाऊंनी होली की शुरुआत बसंत पंचमी से मानी जाती है. इसी दिन से गांवों और कस्बों में होली के गीत गूंजने लगते हैं. ठंडी हवाओं के बीच बसंत की आहट के साथ होली के सुर पूरे माहौल को जीवंत बना देते हैं. हालांकि रंगों वाली होली की असली शुरुआत उस दिन मानी जाती है, जब सबसे पहले भगवान को रंग अर्पित किया जाता है. यह परंपरा होली को धार्मिक और सांस्कृतिक दोनों रूपों में खास बना देती है.

मंदिर से गांव तक पहुंचती है होली

पहाड़ों में होली का शुभारंभ हमेशा मंदिर से होता है. सबसे पहले भगवान के सामने होली के गीत गाए जाते हैं और उन्हें रंग लगाया जाता है. इसके बाद यही होली मंदिर से निकलकर पूरे गांव और फिर एक-एक घर तक पहुंचती है. पहले देवता की होली, फिर समाज की होली का यह क्रम आपसी सम्मान और आस्था को दर्शाता है.

बैठ होली: शास्त्रीय संगीत का स्वरूप

कुमाऊं में होली का एक प्रमुख रूप बैठ होली है. इसमें लोग एक जगह बैठकर शास्त्रीय रागों पर आधारित होली गीत गाते हैं. हारमोनियम और तबले की संगत के साथ गाए जाने वाले ये गीत भक्ति, प्रेम और दर्शन से जुड़े होते हैं. बैठ होली का माहौल शांत, गंभीर और आत्मिक होता है, जहां हर शब्द और हर सुर दिल को छू जाता है.

खड़ी होली: उल्लास और सामूहिक नृत्य

खड़ी होली कुमाऊंनी होली का दूसरा प्रमुख रूप है. इसमें लोग खड़े होकर ढोलक और मंजीरों के साथ नाचते-गाते हैं. होल्यार टोली बनाकर गांव के अलग-अलग घरों में जाते हैं और होली के गीतों से वातावरण को रंगीन बना देते हैं. जो लोग यह होली गाते हैं, उन्हें होल्यार कहा जाता है. यह होली उत्साह, ऊर्जा और सामूहिक भागीदारी का प्रतीक होती है.

होल्यार और घर-घर की परंपरा

होल्यार हर शाम किसी नए घर में पहुंचते हैं. घरों में उनका स्वागत गुड़ और सौंफ से किया जाता है, जिसे मिठास, अपनापन और प्रेम का प्रतीक माना जाता है. यह परंपरा सदियों से चली आ रही है और आज भी उसी सादगी और श्रद्धा के साथ निभाई जाती है. इस दौरान गांवों में शोर या उग्रता नहीं, बल्कि सौम्य और आत्मीय वातावरण बना रहता है.

ऋतु परिवर्तन और नई फसल का संकेत

कुमाऊंनी होली केवल बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक नहीं है. यह त्योहार पहाड़ों की लंबी सर्दियों के अंत और नई फसल के मौसम की शुरुआत का संकेत भी देता है. जब ठंड के बाद बसंत आता है, तो होली के गीतों के साथ प्रकृति भी मुस्कुराने लगती है. पेड़ों पर नई कोंपलें, खेतों में हरियाली और लोगों के चेहरों पर सुकून दिखाई देता है.

रंगों से आगे रिश्तों का उत्सव

इस तरह कुमाऊंनी होली सिर्फ एक पर्व नहीं, बल्कि पहाड़ों की संस्कृति, संगीत और इंसानी रिश्तों का जीवंत उत्सव है. यह त्योहार हर साल लोगों को जोड़ता है और यह याद दिलाता है कि सादगी, प्रेम और सामूहिकता ही किसी भी परंपरा की असली ताकत होती है.

Tags: holi
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