नेपाल की भोते कोशी और त्रिशूली घाटियों में 26 अगस्त को हुई प्राकृतिक आपदा ने वैज्ञानिकों को भी हैरान कर दिया। लैंगटांग लिरुंग पर्वत से करीब 11 करोड़ क्यूबिक मीटर चट्टान और बर्फ टूटकर नीचे आ गिरी। इसके बाद बड़े पैमाने पर भूस्खलन हुआ और देखते ही देखते मलबे और पानी की खतरनाक बाढ़ घाटी की ओर बढ़ गई।
हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, वैज्ञानिकों का मानना है कि इस आपदा के पीछे कोई एक वजह नहीं थी। कई वर्षों से भूकंप, ग्लेशियर के पीछे हटने, बढ़ते तापमान, बर्फ के पिघलने और बारिश के पैटर्न में बदलाव जैसे कारक पहाड़ को धीरे-धीरे कमजोर कर रहे थे।
2015 के भूकंप ने चट्टानों को पहले ही कमजोर कर दिया था
वैज्ञानिकों के मुताबिक, अप्रैल 2015 में नेपाल में आए 7.8 तीव्रता के भूकंप ने हिमालय के कई हिस्सों को प्रभावित किया था। इस दौरान मध्य नेपाल में करीब 25 हजार से ज्यादा भूस्खलन दर्ज किए गए थे। लैंगटांग लिरुंग के दक्षिणी हिस्से में भी चट्टान और बर्फ का बड़ा हिस्सा नीचे आया था, जिसने लैंगटांग गांव को दबा दिया था और करीब 400 लोगों की जान गई थी।
इसके बाद कई वर्षों तक पर्वत की निगरानी की गई। इसमें उत्तरी और दक्षिणी ढलानों पर भूस्खलन की गतिविधियों में बढ़ोतरी देखी गई। वैज्ञानिकों का कहना है कि 2015 का भूकंप इस खास ढलान को कमजोर करने वाले कारणों में शामिल हो सकता है, हालांकि इसकी भूमिका को पूरी तरह साबित नहीं किया जा सका है।
ग्लेशियर पीछे हटा तो चट्टान का प्राकृतिक सहारा भी कम हुआ
लैंगटांग-लिरुंग ग्लेशियर भी पिछले कई दशकों में तेजी से सिकुड़ा है। आंकड़ों के मुताबिक, 1815 में इसका क्षेत्रफल करीब 18.9 वर्ग किलोमीटर था, जो 24 अगस्त 2026 तक घटकर लगभग 7.34 वर्ग किलोमीटर रह गया।
2010 के बाद ग्लेशियर के सिकुड़ने की रफ्तार और तेज हुई। जिस बर्फीले हिस्से का दबाव और सहारा पहाड़ की चट्टानी दीवार को मिला हुआ था, उसके पीछे हटने से ढलान की स्थिरता प्रभावित हुई।
बढ़ते तापमान ने चट्टानों के बीच जमी बर्फ भी पिघलाई
ऊंचे पर्वतीय इलाकों में चट्टानों की दरारों के भीतर जमा बर्फ और पर्माफ्रॉस्ट लंबे समय तक चट्टानों को एक-दूसरे से मजबूती से जोड़े रखने में मदद करते हैं। तापमान बढ़ने के साथ यह बर्फ पिघलने लगी।
बर्फ के पिघलने के बाद चट्टानों के बीच पकड़ कमजोर हो सकती है। इसके अलावा पानी दरारों के अंदर गहराई तक पहुंचकर चट्टान की संरचना को और प्रभावित कर सकता है। वैज्ञानिकों के मुताबिक, इस प्रक्रिया ने भी लैंगटांग लिरुंग की ढलान को अस्थिर बनाने में भूमिका निभाई हो सकती है।
जहां बर्फ गिरती थी, वहां अब बारिश बढ़ रही है
पर्वतीय क्षेत्रों में बारिश और बर्फबारी के पैटर्न में भी बदलाव देखने को मिल रहा है। तापमान बढ़ने के कारण वह ऊंचाई ऊपर खिसक रही है, जहां बारिश की जगह बर्फबारी होती है।
बर्फ धीरे-धीरे पिघलती है, जबकि बारिश का पानी सीधे चट्टानों की दरारों में प्रवेश कर सकता है। इससे दरारें और कमजोर होने की संभावना बढ़ जाती है। हालांकि वैज्ञानिकों के मुताबिक, बारिश और बर्फबारी की इस बदलती सीमा का सीधे मानव-जनित जलवायु परिवर्तन से संबंध साबित करने के लिए अभी और अध्ययन की जरूरत है।
क्लाइमेट चेंज अकेला कारण नहीं, लेकिन बढ़ा सकता है खतरा
World Weather Attribution (WWA) की वैज्ञानिक टीम ने इस घटना का अध्ययन किया। वैज्ञानिकों के मुताबिक, क्लाइमेट चेंज को 26 अगस्त की आपदा का अकेला कारण नहीं कहा जा सकता, लेकिन बढ़ता तापमान पहाड़ों और ग्लेशियरों को पहले से ज्यादा अस्थिर बनाने में भूमिका निभा रहा है।
Imperial College London की क्लाइमेट साइंटिस्ट Friederike Otto के मुताबिक, इंसानों की वजह से हो रहे जलवायु परिवर्तन ने इस तरह की आपदा के लिए परिस्थितियां तैयार करने में भूमिका निभाई। हालांकि शोधकर्ताओं ने यह निष्कर्ष नहीं निकाला कि मानव-जनित जलवायु परिवर्तन नहीं होता तो यह हिमस्खलन निश्चित रूप से नहीं होता।
करीब 2.2 वर्ग किलोमीटर चट्टान टूटकर नीचे आई
सैटेलाइट तस्वीरों के विश्लेषण के मुताबिक, लैंगटांग लिरुंग पर्वत के उत्तरी हिस्से में करीब 2.2 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र की चट्टान लगभग 50 मीटर की गहराई तक टूटकर करीब 5,150 मीटर की ऊंचाई से नीचे गिरी।
पहले चट्टान का हिस्सा टूटा और उसके साथ ऊपर मौजूद ग्लेशियर का बड़ा हिस्सा भी नीचे आ गया। विशाल मलबा करीब 1,400 मीटर नीचे घाटी तक पहुंचा। इसके टकराने से इतनी ऊर्जा पैदा हुई कि उसका प्रभाव करीब 5.2 तीव्रता के भूकंप के बराबर था। यही वजह है कि शुरुआत में भूकंप मापने वाले उपकरणों ने इसे छोटे भूकंप या कंपन की तरह रिकॉर्ड किया।
7-8 मिनट में 20 किलोमीटर तक पहुंच गया मलबा
पहाड़ से नीचे गिरते समय चट्टान और बर्फ के बीच घर्षण से ग्लेशियर की कुछ बर्फ पिघल गई। नीचे पहुंचने के बाद मलबा उस बर्फ से भी टकराया जो पुराने ग्लेशियर के पीछे हटने के बाद जमीन के अंदर मौजूद थी। इससे पानी और मलबे की मात्रा और बढ़ गई।
जब यह मलबा ल्हेंडे खोला नदी में पहुंचा तो यह तेज रफ्तार वाली मलबे की बाढ़ में बदल गया। संकरी घाटी ने इसकी गति और बढ़ा दी। वैज्ञानिकों के मुताबिक, मलबे ने करीब 20 किलोमीटर की दूरी सिर्फ 7 से 8 मिनट में तय की।
बाढ़ का पानी चीन की सीमा की ओर भी बढ़ा
तेज रफ्तार मलबे की बाढ़ ने आगे जाकर नदी के पानी को इतनी ताकत से धक्का दिया कि करीब 2 किलोमीटर तक पानी वापस ऊपर की ओर चीन की सीमा की तरफ चला गया।
बाढ़ अपने रास्ते में करीब 3.05 करोड़ क्यूबिक मीटर मिट्टी, पत्थर और मलबा जमा करती चली गई। इसकी चपेट में खेत, बस्तियां और हाइड्रो इलेक्ट्रिक पावर प्लांट भी आए।
88 किलोमीटर दूर त्रिशूली नदी का जलस्तर 8.5 मीटर बढ़ा
इस आपदा का असर काफी दूर तक देखने को मिला। करीब 88 किलोमीटर नीचे गल्छी में त्रिशूली नदी का जलस्तर लगभग 8.5 मीटर तक बढ़ गया।
इस घटना ने यह भी दिखाया कि ऊंचे पहाड़ों में होने वाला भूस्खलन और ग्लेशियर से जुड़ी घटनाएं कितनी तेजी से बड़े क्षेत्र को प्रभावित कर सकती हैं।
हिमालय में तापमान औद्योगिक दौर से पहले के मुकाबले 1.5°C ज्यादा
स्टडी के मुताबिक, उत्तरी नेपाल और तिब्बती पठार समेत बड़े हिमालयी क्षेत्र में जुलाई और अगस्त का तापमान औद्योगिक युग से पहले के स्तर की तुलना में करीब 1.5°C ज्यादा हो चुका है। पूरे साल का औसत तापमान करीब 2°C बढ़ा है।
वहीं, बर्फ पिघलने की ऊंचाई भी हर दशक में लगभग 50 से 100 मीटर ऊपर खिसक रही है। इसका मतलब है कि ऐसी चट्टानें और बर्फीले हिस्से जो पहले लंबे समय तक जमे रहते थे, अब अधिक गर्मी के संपर्क में आ रहे हैं।
12 सितंबर तक 1,386 मौतें, 5,130 लोग लापता
नेपाल सरकार के 12 सितंबर तक के आंकड़ों के मुताबिक, इस बाढ़ में 1,386 लोगों की मौत हो चुकी थी, जबकि करीब 5,130 लोग लापता बताए गए थे।
सरकार ने अनुमान लगाया कि आपदा से नेपाल को करीब 2.7 अरब डॉलर का आर्थिक नुकसान हुआ। प्रभावित इलाकों के पुनर्निर्माण और बहाली पर करीब 4.8 अरब डॉलर खर्च होने का अनुमान लगाया गया है।
मौजूदा बाढ़ चेतावनी सिस्टम के लिए भी बड़ी चुनौती
रिसर्चर्स के मुताबिक, यह घटना सामान्य नदी की बाढ़ से काफी अलग थी। इसकी गति, तीव्रता और जटिलता इतनी अधिक थी कि नेपाल में मौजूद बाढ़ चेतावनी प्रणालियां इस तरह की घटना का सटीक अनुमान लगाने के लिए तैयार नहीं थीं।
विश्लेषण के मुताबिक, अगर ढलान खिसकने की शुरुआत का तुरंत पता भी चल जाता और उसी समय चेतावनी जारी कर दी जाती, तब भी रासुवागढ़ी और तिमुरे जैसे ऊपर की ओर बसे इलाकों के लोगों के पास सुरक्षित स्थान तक पहुंचने के लिए सिर्फ 7 से 8 मिनट होते।
इतने कम समय में बड़े पैमाने पर बचाव मुश्किल
रिसर्च में कहा गया है कि शुरुआती चेतावनी कुछ लोगों की जान बचाने में मदद कर सकती थी, लेकिन इतनी कम अवधि में बड़ी संख्या में लोगों को सुरक्षित निकालना बेहद मुश्किल था। इसलिए इतने बड़े स्तर पर जान-माल के नुकसान को पूरी तरह रोक पाना चुनौतीपूर्ण था।
Friederike Otto ने कहा कि नेपाल जैसे देशों में रहने वाले लोगों को ऐसी आपदाओं की कीमत चुकानी पड़ रही है, जबकि जीवाश्म ईंधन के इस्तेमाल से होने वाला वैश्विक उत्सर्जन जलवायु परिवर्तन को बढ़ा रहा है।
वैज्ञानिकों का संदेश: हिमालय में बदल रहा है खतरे का स्वरूप
इस अध्ययन में नेपाल के अलावा ब्रिटेन, आयरलैंड, स्वीडन, डेनमार्क, नॉर्वे, अमेरिका, न्यूजीलैंड, पाकिस्तान और नीदरलैंड के वैज्ञानिक शामिल थे।
रिसर्च का मुख्य निष्कर्ष यह है कि ऊंचे पर्वतीय इलाकों का पर्यावरण तेजी से बदल रहा है। बढ़ता तापमान ग्लेशियरों, पर्माफ्रॉस्ट और पहाड़ों की स्थिरता को प्रभावित कर रहा है। हिमालय पहले से ही भूकंप और भूस्खलन जैसे प्राकृतिक खतरों वाला क्षेत्र है, ऐसे में बदलती जलवायु इन जोखिमों को और जटिल बना सकती है।
यह घटना इस बात का भी संकेत देती है कि भविष्य में सिर्फ पारंपरिक नदी-बाढ़ की निगरानी पर्याप्त नहीं हो सकती। पहाड़ों में भूस्खलन, ग्लेशियर, अचानक बनने वाली मलबे की बाढ़ और बदलते मौसम को एक साथ ध्यान में रखकर आपदा चेतावनी और बचाव व्यवस्था को तैयार करना जरूरी होगा।


