केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद राजनीतिक गलियारों में नई बहस शुरू हो गई है। सवाल उठ रहे हैं कि क्या यह फैसला केवल छात्र आंदोलन के दबाव का नतीजा था या फिर भाजपा ने अपने बड़े राजनीतिक एजेंडे को ध्यान में रखते हुए यह रणनीतिक कदम उठाया।
पिछले एक महीने से दिल्ली के जंतर-मंतर पर कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के नेतृत्व में छात्र कथित NEET पेपर लीक और परीक्षा व्यवस्था में सुधार की मांग को लेकर प्रदर्शन कर रहे थे। आंदोलन की सबसे बड़ी मांग धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की थी। शुरुआत में सरकार इस मांग पर झुकती नहीं दिखी, लेकिन आंदोलन के बढ़ते दायरे और राजनीतिक दबाव के बीच आखिरकार प्रधान ने पद छोड़ दिया।
आंदोलन ने बढ़ाया सरकार पर दबाव
प्रदर्शन को नई गति तब मिली जब शिक्षा सुधारों की मांग को लेकर सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल पर बैठ गए। इसके बाद 20 जुलाई को संसद मार्च के दौरान प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच हुई झड़प ने पूरे आंदोलन को राष्ट्रीय मुद्दा बना दिया।
इस बीच विपक्षी दलों ने भी इस मुद्दे को संसद और सड़क दोनों जगह जोर-शोर से उठाया। मानसून सत्र की शुरुआत भी इसी विवाद के कारण हंगामेदार रही और संसद का कामकाज प्रभावित हुआ।
सरकार ने क्यों बदला रुख?
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि सरकार लंबे समय तक शिक्षा मंत्री के इस्तीफे से बचना चाहती थी, क्योंकि इससे भविष्य में ऐसे आंदोलनों के सामने झुकने की मिसाल बन सकती थी। हालांकि, लगातार बढ़ते विरोध और संसद में राजनीतिक गतिरोध के बीच सरकार ने हालात को नियंत्रित करने के लिए अंततः धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा स्वीकार कर लिया।
बड़े राजनीतिक एजेंडे पर नजर
चर्चा यह भी है कि सरकार मानसून सत्र में अपने कई महत्वपूर्ण विधेयकों और राजनीतिक एजेंडे पर आगे बढ़ना चाहती है। ऐसे में जंतर-मंतर का आंदोलन सरकार के लिए लगातार चुनौती बनता जा रहा था। माना जा रहा है कि आंदोलन खत्म कराने और संसद में सामान्य कामकाज बहाल करने के लिए यह फैसला अहम साबित हुआ।
विपक्ष को मिला बड़ा मुद्दा
धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे से पहले कांग्रेस समेत कई विपक्षी दल लगातार सरकार पर हमलावर थे। विपक्ष का आरोप था कि परीक्षा प्रणाली में कथित गड़बड़ियों की जिम्मेदारी तय होनी चाहिए। वहीं सरकार परीक्षा सुधारों, सख्त कानून और संस्थागत बदलावों की बात करती रही।
अब शिक्षा मंत्री के इस्तीफे के बाद राजनीतिक चर्चा इस बात पर केंद्रित है कि क्या यह केवल एक मंत्री का इस्तीफा था या फिर भाजपा की व्यापक राजनीतिक रणनीति का हिस्सा।


