लद्दाख के सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक की भूख हड़ताल अब 20वें दिन में प्रवेश कर चुकी है. उनकी लगातार बिगड़ती सेहत और सरकार से टकराव के बीच देश में एक बार फिर उस ऐतिहासिक अनशन की याद ताज़ा हो गई है, जिसने आज़ाद भारत के राजनीतिक भूगोल को हमेशा के लिए बदल दिया था. यह कहानी है पोट्टी श्रीरामुलु की, जिनकी 58 दिन की भूख हड़ताल ने अलग आंध्र राज्य के गठन का रास्ता खोल दिया.
जब एक अनशन ने सरकार को झुकने पर मजबूर कर दिया
आजादी के कुछ साल बाद तक भारत में राज्यों का गठन भाषाई आधार पर नहीं हुआ था. तेलुगु भाषी लोग लंबे समय से अपनी अलग पहचान और राज्य की मांग कर रहे थे. उस वक्त यह इलाका मद्रास राज्य का हिस्सा था.
इसी मांग को लेकर 19 अक्टूबर 1952 को पोट्टी श्रीरामुलु ने आमरण अनशन शुरू किया. उन्होंने पूरे 58 दिनों तक अन्न का एक दाना नहीं खाया. आखिरकार 15 दिसंबर 1952 को उनकी मौत हो गई. वे अपने जीवनकाल में अलग आंध्र राज्य नहीं देख पाए, लेकिन उनकी शहादत ने पूरे देश को झकझोर दिया.
उनके निधन के बाद तेलुगु भाषी क्षेत्रों में जबरदस्त विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए. कई जगह हिंसा भड़की, पुलिस फायरिंग हुई और हालात लगातार बिगड़ते चले गए. बढ़ते जनदबाव के बीच तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने श्रीरामुलु की मौत के महज चार दिन बाद अलग आंध्र राज्य बनाने की घोषणा कर दी. यही आंदोलन आगे चलकर भारत में भाषाई आधार पर राज्यों के पुनर्गठन की सबसे बड़ी वजह बना.
सोनम वांगचुक का आंदोलन क्यों अलग है?
करीब 74 साल बाद एक बार फिर देश भूख हड़ताल को लेकर चर्चा कर रहा है. हालांकि इस बार मुद्दा अलग है.
सोनम वांगचुक का आंदोलन अलग राज्य की मांग नहीं, बल्कि NEET-UG पेपर लीक मामले में जवाबदेही तय करने और केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग को लेकर है.
लगातार अनशन के चलते उनका वजन 9 किलो से ज्यादा घट चुका है. उनकी सेहत को देखते हुए दिल्ली हाई कोर्ट ने नियमित मेडिकल जांच कराने के निर्देश दिए हैं और कहा है कि किसी भी आंदोलन से बढ़कर इंसानी जिंदगी की कीमत होती है.
इसके बावजूद वांगचुक का कहना है कि जब तक सरकार उनकी मांगों पर ठोस कदम नहीं उठाती, तब तक उनका अनशन जारी रहेगा. उन्होंने लोगों से 20 जुलाई को ‘चलो संसद’ मार्च में बड़ी संख्या में शामिल होने की अपील भी की है.
कौन थे पोट्टी श्रीरामुलु?
1901 में जन्मे पोट्टी श्रीरामुलु पेशे से सैनिटरी इंजीनियर थे और रेलवे में नौकरी करते थे. लेकिन 1928 में पत्नी और नवजात बेटे की मौत ने उनकी जिंदगी की दिशा बदल दी. इस गहरे सदमे के बाद उन्होंने नौकरी छोड़ दी और खुद को पूरी तरह समाज सेवा के लिए समर्पित कर दिया.
1930 में उन्होंने महात्मा गांधी के नमक सत्याग्रह में हिस्सा लिया और बाद में साबरमती आश्रम से जुड़े. व्यक्तिगत सत्याग्रह और भारत छोड़ो आंदोलन में भाग लेने के कारण उन्हें करीब 18 महीने जेल भी रहना पड़ा.
दलित अधिकारों के लिए भी लड़ी बड़ी लड़ाई
पोट्टी श्रीरामुलु सिर्फ अलग आंध्र राज्य के आंदोलन तक सीमित नहीं थे. उन्होंने दलितों के मंदिर प्रवेश और सामाजिक बराबरी के लिए भी लंबा संघर्ष किया.
1946 में उन्होंने मद्रास प्रांत के मंदिरों को दलितों के लिए खोलने की मांग को लेकर आमरण अनशन शुरू किया था. कई नेताओं ने उन्हें मनाने की कोशिश की, लेकिन वे नहीं माने. आखिरकार महात्मा गांधी के आग्रह पर उन्होंने अपना अनशन समाप्त किया.
कैसे तेज हुई अलग आंध्र की मांग?
1952 तक अलग आंध्र राज्य की मांग काफी मजबूत हो चुकी थी. विधानसभा चुनावों में भी तेलुगु क्षेत्रों में कांग्रेस को बड़ा नुकसान उठाना पड़ा और अलग राज्य का समर्थन करने वाले दलों को जनता का भरपूर साथ मिला.
सबसे बड़ा विवाद मद्रास (आज का चेन्नई) को लेकर था. तेलुगु नेताओं का नारा था— ‘मद्रास मनादे’, यानी मद्रास हमारा है. लेकिन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और तत्कालीन मुख्यमंत्री सी. राजगोपालाचारी इस मांग के खिलाफ थे. उनका साफ कहना था कि अगर नया आंध्र राज्य बनेगा भी, तब भी मद्रास शहर उसका हिस्सा नहीं होगा.
58 दिन तक जारी रहा ऐतिहासिक अनशन
19 अक्टूबर 1952 से शुरू हुआ श्रीरामुलु का आमरण अनशन धीरे-धीरे पूरे आंदोलन का केंद्र बन गया. हजारों लोग उनके समर्थन में सड़कों पर उतर आए. जगह-जगह बंद, प्रदर्शन और रैलियां होने लगीं.
करीब छह सप्ताह गुजरने के बाद भी केंद्र सरकार अपने रुख पर कायम रही. नेहरू ने यहां तक कहा था कि अगर सरकारी फैसले भूख हड़ताल के दबाव में लिए जाने लगे, तो लोकतंत्र के लिए यह सही नहीं होगा.
हालांकि जनता का दबाव लगातार बढ़ता गया और आखिरकार सरकार को झुकना पड़ा.
जब अनशन ने ले ली जान
लगातार 58 दिनों तक भोजन न मिलने से पोट्टी श्रीरामुलु का शरीर पूरी तरह जवाब दे चुका था. उनकी आंखें धंस गई थीं, गला इतना खराब हो चुका था कि पानी पीना भी मुश्किल हो गया था. खून की उल्टियां और लगातार हिचकियां उनकी गंभीर हालत का संकेत थीं.
डॉक्टरों ने कई बार अनशन तोड़ने की सलाह दी, लेकिन उन्होंने अपना फैसला नहीं बदला. बताया जाता है कि आखिरी समय में बोलने की ताकत भी नहीं बची थी. उन्होंने सिर्फ होंठों पर उंगली रखकर संकेत दिया कि वे पीछे नहीं हटेंगे. 15 दिसंबर 1952 को 51 वर्ष की उम्र में उनका निधन हो गया.
मौत के बाद भड़का जनआक्रोश
श्रीरामुलु की मौत की खबर फैलते ही पूरे तेलुगु क्षेत्र में उग्र प्रदर्शन शुरू हो गए. सरकारी दफ्तरों पर हमले हुए, ट्रेनों को रोका गया और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाया गया. कई जगह पुलिस फायरिंग भी हुई, जिसमें प्रदर्शनकारियों की जान चली गई.
बढ़ते तनाव के बीच केंद्र सरकार ने आखिरकार 19 दिसंबर 1952 को अलग आंध्र राज्य बनाने की घोषणा कर दी. हालांकि मद्रास शहर को नए राज्य में शामिल नहीं किया गया.
इसके बाद 1 अक्टूबर 1953 को आंध्र राज्य आधिकारिक तौर पर अस्तित्व में आया और कुरनूल उसकी पहली राजधानी बनी.
कैसे बदला भारत का राजनीतिक नक्शा
1956 में आंध्र राज्य का तेलंगाना क्षेत्र के साथ विलय हुआ और आंध्र प्रदेश का गठन हुआ. फिर 2014 में तेलंगाना अलग राज्य बन गया.
पोट्टी श्रीरामुलु का बलिदान सिर्फ एक राज्य के गठन तक सीमित नहीं रहा. उनके आंदोलन ने भारत में भाषाई आधार पर राज्यों के पुनर्गठन की नींव रखी. यही वजह है कि आज भी उन्हें भारतीय लोकतांत्रिक आंदोलनों के सबसे प्रभावशाली और निर्णायक चेहरों में गिना जाता है.


