सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को हल्द्वानी के वनभूलपुरा इलाके में लंबे समय से रह रहे हजारों परिवारों को लेकर एक अहम फैसला सुनाया है. कोर्ट ने हल्द्वानी में रेलवे की जमीन पर रह रहे लोगों को लेकर फैसला सुनाते हुए कहा कि उस जमीन पर रह रहे लोगों का जमीन पर कोई कानूनी अधिकार नहीं है. इसका मतलब है कि रेलवे के विस्तार के लिए हजारों परिवारों को यह जगह खाली करनी होगी. हालांकि, कोर्ट ने कहा कि जो परिवार पात्र हैं उन्हें प्रधानमंत्री आवास योजना यानी PMAY के तहत घर दिलाने में मदद की जाए.
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की बेंच ने कहा कि रेलवे जमीन पर कब्जे का मामला ज्यादा समय तक लंबित नहीं रह सकता. कोर्ट ने साफ कहा कि सरकारी जमीन पर रहने से वो जमीन आपकी नहीं हो जाती. सुनवाई के दौरान जस्टिस बागची ने कहा कि यह जमीन रेलवे की है और इस बात पर कोई विवाद नहीं है. लोगों को वहां रहने दिया गया था क्योंकि अधिकारियों ने समय पर कार्रवाई नहीं की. उन्होंने कहा कि आप वहां रियायत के तौर पर रह रहे थे, इसे अपना अधिकार नहीं कह सकते.
PMAY के तहत दिया जाएगा घर
कोर्ट ने यह भी माना कि रेलवे परियोजना को बदलने या कम करने का फैसला तकनीकी विशेषज्ञों का काम है, इसलिए उसने याचिकाकर्ताओं की यह मांग ठुकरा दी. मानवीय पहलू को देखते हुए कोर्ट ने नैनीताल के जिला मजिस्ट्रेट, हल्द्वानी के उप जिलाधिकारी और जिला विधिक सेवा प्राधिकरण को निर्देश दिया कि वो प्रभावित इलाके में कैंप लगाएं और लोगों को PMAY के लिए आवेदन करने में मदद करें.
कोर्ट ने कहा कि अगर 31 मार्च तक पात्र परिवारों के आवेदन पूरे हो जाएं तो अच्छा रहेगा. जिला प्रशासन और राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण को स्थिति रिपोर्ट देने को कहा गया है. मामले की अगली सुनवाई अप्रैल में होगी.
6 महीने 2 हज़ार रुपये की मदद
केंद्र सरकार की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने बताया कि पात्र परिवारों को उत्तराखंड या उत्तर प्रदेश में PMAY के तहत घर दिए जा सकते हैं. साथ ही 6 महीने तक हर महीने 2 हजार रुपये की मदद भी दी जा सकती है. जिन 13 लोगों के पास फ्रीहोल्ड जमीन है उन्हें अधिग्रहण के जरिए मुआवजा मिलेगा.
निवासियों के वकील ने क्या कहा?
निवासियों की ओर से वकील प्रशांत भूषण ने कहा कि कई परिवार 4 से 5 दशकों से वहां रह रहे हैं और राज्य ने पहले बस्ती को नियमित करने की बात कही थी. उन्होंने यह भी कहा कि रेलवे को पूरी जमीन की जरूरत नहीं है.
वरिष्ठ वकील कॉलिन गोंसाल्विस ने धार्मिक स्थलों के हटने पर चिंता जताई और कहा कि पहले पुनर्वास होना चाहिए. इस पर मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि लोग खराब हालात में रह रहे हैं जहां पीने का साफ पानी, बिजली और सीवर की व्यवस्था नहीं है. उन्हें फैसला करने दें कि वो PMAY के तहत घर लेना चाहते हैं या नहीं. अगर कोई दिक्कत होगी तो कोर्ट देखेगा.
50 हजार लोग होंगे बेघर
केंद्र ने कहा कि हल्द्वानी में रेलवे ढांचे का विस्तार जरूरी है क्योंकि नदी के पानी से पटरियों को नुकसान हुआ है और पहाड़ी क्षेत्र में सुरक्षा इंतजाम जरूरी हैं. यह मामला करीब 29 एकड़ रेलवे जमीन का है जहां 4 हजार से ज्यादा परिवार यानी करीब 50 हजार लोग रह रहे हैं. रेलवे ने 4 हजार 365 अतिक्रमणकारियों की पहचान की है.
सुप्रीम कोर्ट ने पहले क्या कहा था?
इससे पहले 5 जनवरी 2023 को सुप्रीम कोर्ट ने उत्तराखंड हाई कोर्ट के तुरंत बेदखली के आदेश पर रोक लगा दी थी और कहा था कि इतनी बड़ी आबादी को एकदम से नहीं हटाया जा सकता. 24 जुलाई 2024 को सुप्रीम कोर्ट ने उत्तराखंड के मुख्य सचिव को केंद्र और रेलवे के साथ मिलकर पुनर्वास योजना बनाने का निर्देश दिया था.
रेलवे ने 2023 के मानसून में सुरक्षा दीवार गिरने के बाद कुछ जमीन तक पहुंच की मांग की थी. उत्तराखंड हाई कोर्ट ने पहले एक हफ्ते का नोटिस देकर अतिक्रमण हटाने का आदेश दिया था.
अब सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा है कि अतिक्रमण करने वाले सार्वजनिक जमीन पर अधिकार नहीं जता सकते, लेकिन पात्र परिवारों का समय पर पुनर्वास किया जाए और रेलवे विस्तार का काम आगे बढ़े. अप्रैल में कोर्ट प्रगति की समीक्षा करेगा.


