उत्तराखंड सरकार राज्य में ईको टूरिज्म को बढ़ावा देने की दिशा में बड़ा कदम उठाने जा रही है. वन विभाग ने जबरखेत नेचर रिजर्व की तर्ज पर प्रदेश के आठ वन क्षेत्रों को ईको टूरिज्म हब के रूप में विकसित करने की योजना तैयार की है. इसका उद्देश्य प्रकृति संरक्षण के साथ पर्यटन को बढ़ावा देना और स्थानीय लोगों के लिए रोजगार के नए अवसर पैदा करना है.
मुख्य सचिव आनंद बर्द्धन के निर्देशों के बाद वन विभाग ने चयनित स्थलों की कार्ययोजना को अंतिम रूप देना शुरू कर दिया है. इन क्षेत्रों में ट्रेकिंग, बर्ड वॉचिंग और प्रकृति आधारित पर्यटन गतिविधियों को विकसित किया जाएगा. साथ ही स्थानीय युवाओं को होमस्टे और गाइड के रूप में रोजगार के अवसर उपलब्ध कराए जाएंगे.
अर्थव्यवस्था को भी मिलेगी मजबूती
प्रदेश का लगभग 71.05 प्रतिशत भूभाग वन क्षेत्र है. सरकार चाहती है कि प्राकृतिक वातावरण से बिना छेड़छाड़ किए पर्यटकों को नया अनुभव मिले और स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी मजबूती मिले. जबरखेत नेचर रिजर्व का सफल मॉडल इसी सोच का आधार बना है.
मुख्य वन संरक्षक पी.के. पात्रो ने बताया कि जबरखेत मॉडल का अध्ययन किया जा चुका है और उसी के आधार पर चयनित स्थलों के विकास की योजना तैयार की जा रही है.
इन 8 स्थानों को बनाया जाएगा ईको टूरिज्म हब
- महेशखान (नैनीताल) – 35 लाख रुपये
- नैना-किलबरी (नैनीताल) – 60 लाख रुपये
- रोशलीखाल-खुरैत सौड़ (नरेंद्रनगर) – 85 लाख रुपये
- नीरगाड-कुंजापुरी (नरेंद्रनगर) – 35 लाख रुपये
- कौड़िया (नई टिहरी) – 30 लाख रुपये
- गंगोत्री पांडव गुफा (उत्तरकाशी) – 33 लाख रुपये
- बिनसर (अल्मोड़ा) – 65 लाख रुपये
- बिनोग (मसूरी) – 60 लाख रुपये
सरकार का मानना है कि इन परियोजनाओं से पर्यावरण संरक्षण के साथ-साथ पर्यटन को नई पहचान मिलेगी और ग्रामीण क्षेत्रों में आजीविका के अवसर भी बढ़ेंगे.


