कोटा की कोचिंग और मेडिकल की तैयारी की कहानी सिर्फ बड़े शहरों या संपन्न परिवारों तक सीमित नहीं है। उत्तर प्रदेश के बरेली जिले के नवाबगंज के रहने वाले अल्ताफ ने सीमित संसाधनों और तमाम मुश्किलों के बीच ऐसा मुकाम हासिल किया है, जो हजारों छात्रों के लिए प्रेरणा बन सकता है।
आलू बेचकर परिवार का गुजारा करने वाले अल्ताफ ने NEET-2026 में अपनी आठवीं कोशिश में सफलता हासिल की। उन्होंने 563 अंक प्राप्त किए और उनकी ऑल इंडिया रैंक 27,910 रही। OBC कैटेगरी में उनकी रैंक 13,437 है।
कोटा जाने के पैसे नहीं थे, दोस्तों के नोट्स से शुरू की पढ़ाई
अल्ताफ के लिए मेडिकल की तैयारी का सफर आसान नहीं था। शुरुआत में परिवार के पास इतने पैसे नहीं थे कि वह कोटा जाकर कोचिंग कर सकें। ऐसे में उन्होंने कोटा से पढ़कर लौटे दोस्तों के नोट्स और उपलब्ध स्टडी मैटेरियल से तैयारी शुरू की।
बाद में जब उन्हें महसूस हुआ कि बेहतर मार्गदर्शन के बिना मेडिकल कॉलेज में दाखिला हासिल करना मुश्किल होगा, तो उन्होंने अपने पिता के साथ आलू बेचकर फीस के पैसे जुटाए और कोटा जाकर तैयारी शुरू की।
पहली कोशिश में मिले थे 323 अंक
अल्ताफ ने पहली बार 2019 में NEET की परीक्षा दी थी। उस समय उन्हें 323 अंक मिले। इसके बाद उन्होंने हार नहीं मानी और लगातार अपनी तैयारी में सुधार करते रहे।
ऑनलाइन लेक्चर और दोस्तों से मिले स्टडी मैटेरियल की मदद से वर्ष 2022 में उनके अंक बढ़कर 516 हो गए। इसके बाद 2023 और 2024 में उन्होंने 590 अंक तक हासिल किए, लेकिन मेडिकल कॉलेज में प्रवेश के लिए कटऑफ अधिक रहने के कारण उन्हें दाखिला नहीं मिल सका।
2025 में उनके अंक घटकर 501 रह गए, लेकिन इसके बावजूद उन्होंने तैयारी जारी रखी और आखिरकार आठवीं कोशिश में NEET-2026 में सफलता हासिल कर ली।
भाई के हादसे ने बदल दी जिंदगी
12वीं की पढ़ाई पूरी करने के बाद अल्ताफ अपने पिता के साथ आलू की फड़ पर बैठने लगे थे। इसी दौरान उनके बड़े भाई के साथ हुए एक सड़क हादसे ने उनकी जिंदगी की दिशा बदल दी।
उनके बड़े भाई रात करीब दो बजे बरेली मंडी से आलू लेने जाते थे। इसी दौरान उनका एक्सीडेंट हो गया। इस हादसे ने अल्ताफ को अंदर तक प्रभावित किया और उन्होंने हर हाल में डॉक्टर बनने का संकल्प लिया।
दो कमरों के घर से डॉक्टर बनने तक का सफर
अल्ताफ का परिवार बेहद साधारण आर्थिक पृष्ठभूमि से आता है। उनके पिता इकबाल हुसैन नौवीं कक्षा तक पढ़े हैं, जबकि उनकी मां निरक्षर हैं। परिवार में आठ बहनें और एक बड़ा भाई है।
वर्ष 2015 तक परिवार के कुल 12 सदस्य महज दो कमरों के मकान में रहते थे। इसके अलावा पिता के सामने सभी बेटियों की शादी की जिम्मेदारी भी थी। ऐसी परिस्थितियों में मेडिकल की महंगी पढ़ाई और कोचिंग का खर्च जुटाना परिवार के लिए बड़ी चुनौती थी।
लेकिन अल्ताफ ने परिस्थितियों को अपनी कमजोरी नहीं बनने दिया। पिता के साथ काम किया, फीस के लिए पैसे जुटाए, लगातार परीक्षा दी और हर असफलता के बाद दोबारा तैयारी में जुट गए।
सीमित संसाधनों में बड़े सपने देखने वालों के लिए मिसाल
अल्ताफ की कहानी सिर्फ NEET पास करने की कहानी नहीं है। यह लगातार असफलताओं के बावजूद कोशिश करते रहने और सीमित संसाधनों में अपने लक्ष्य के लिए संघर्ष करने की कहानी है।
आठ प्रयासों के बाद हासिल की गई यह सफलता उन हजारों विद्यार्थियों के लिए उम्मीद की किरण है, जो आर्थिक कठिनाइयों के बावजूद डॉक्टर, इंजीनियर या अन्य बड़े करियर का सपना देखते हैं।
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