देहरादून: दून घाटी की धरती के करीब 35 किलोमीटर हिस्से में हालिया भूगर्भीय हलचल के संकेत सामने आए हैं। हिमालय के निर्माण के समय अस्तित्व में आई ऐतिहासिक फॉल्ट लाइन मेन बाउंड्री थ्रस्ट (MBT) के आसपास भू-आकृतियों और नदी तंत्र में हुए बदलावों के अध्ययन से नव-विवर्तनिकी यानी हालिया भूगर्भीय गतिविधि के प्रमाण मिले हैं।
यह अध्ययन वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान के वैज्ञानिकों ने किया है। अध्ययन को हाल ही में ‘Progress in Physical Geography: Earth and Environment’ में अंतिम प्रकाशन से पहले स्वतंत्र समीक्षा के लिए सार्वजनिक किया गया है।
35 किलोमीटर क्षेत्र में फैली है MBT
अध्ययन के अनुसार देहरादून घाटी में मेन बाउंड्री थ्रस्ट (MBT) टौंस और सौंग नदी घाटियों के बीच करीब 35 किलोमीटर तक फैली हुई है। इस फॉल्ट लाइन और इसकी सहायक संरचनाओं के आसपास बनी भू-आकृतियां इनके सक्रिय प्रभाव की ओर संकेत करती हैं।
चट्टानों में मिले दबाव और टूट-फूट के निशान
शोधकर्ताओं को MBT के तत्काल नीचे स्थित ऊपरी शिवालिक चट्टानों के समूह में कांग्लोमरेट चट्टानें अत्यधिक विकृत और शीयर यानी टूट-फूट वाली मिलीं। कांग्लोमरेट ऐसी चट्टान होती है, जो गोल कंकड़ों और अन्य अवसादी पदार्थों के दबाव में जमा होकर बनती है।
अध्ययन में इन चट्टानों का झुकाव भी काफी तीव्र पाया गया, जो कई स्थानों पर लगभग खड़ी स्थिति तक पहुंचता है। वहीं MBT के ऊपर की ओर करीब 1.5 किलोमीटर तक फैले तीन समानांतर फॉल्ट मार्क भी दर्ज किए गए। इनकी पहचान रैखिक रूप से व्यवस्थित पुराने धंसे हुए जल-अवसादों और अत्यधिक विकृत चट्टानों के आधार पर की गई।
नदी तंत्र में भी दिखा भूगर्भीय बदलाव
वैज्ञानिकों ने MBT के अलावा संतौरगढ़ थ्रस्ट, संतौरगढ़ एंटीक्लाइन और नागसिद्ध एंटीक्लाइन से नियंत्रित जलनिकासी तंत्र का भी अध्ययन किया।
इस दौरान पुराने नदी मार्ग यानी पैलियोचैनल, गहराई तक कटे मौजूदा नदी चैनल और रेडियल ड्रेनेज पैटर्न मिले। कुछ स्थानों पर विंड गैप यानी पुराने जल मार्ग के बचे हुए हिस्से 1.5 किलोमीटर से भी अधिक चौड़े पाए गए।
भूगर्भीय हलचल के अनुसार बदला नदी का रास्ता
शोधकर्ताओं के मुताबिक भू-आकृतियों और नदी तंत्र का यह पैटर्न संकेत देता है कि क्षेत्र में सक्रिय भूगर्भीय प्रक्रियाओं के साथ नदी तंत्र ने भी समय के साथ अपना स्वरूप बदला और खुद को समायोजित किया।
इसका मतलब यह है कि दून घाटी की मौजूदा नदी घाटियां केवल जलवायु, मौसम और कटाव की वजह से विकसित नहीं हुई हैं। इनके विकास की दिशा तय करने में भूगर्भीय हलचल की भी महत्वपूर्ण भूमिका रही है।
भूस्खलन का खतरा बढ़ने से जुड़ा अध्ययन
वैज्ञानिकों ने फॉल्ट लाइन की हालिया सक्रियता को क्षेत्र में ढालों के उत्थान, तेज कटाव और ऊंची ढालों की अस्थिरता बढ़ने से भी जोड़ा है।
टौंस और सौंग घाटी के आसपास पिछले कुछ वर्षों में बढ़ती भूस्खलन गतिविधियों के संदर्भ में भी यह अध्ययन महत्वपूर्ण माना जा रहा है। हालांकि, फॉल्ट लाइन की सक्रियता और किसी विशेष भूस्खलन के बीच सीधा कारण-परिणाम संबंध स्थापित करने के लिए आगे के विस्तृत अध्ययन जरूरी होंगे।
ध्यान देने वाली बात
यह अध्ययन अभी अंतिम रूप से प्रकाशित शोधपत्र के रूप में सामने नहीं आया है, बल्कि अंतिम प्रकाशन से पहले स्वतंत्र समीक्षा की प्रक्रिया में है। इसलिए इसके निष्कर्षों को वैज्ञानिक अध्ययन के प्रारंभिक निष्कर्षों के तौर पर देखना उचित होगा।


