नई दिल्ली. दिल्ली हाई कोर्ट ने जलवायु कार्यकर्ता सोनम वांगचुक को जंतर-मंतर से सफदरजंग अस्पताल शिफ्ट किए जाने के सरकार के फैसले को सही ठहराया है. कोर्ट ने कहा कि लंबी भूख हड़ताल के कारण उनकी तबीयत बिगड़ रही थी, इसलिए उन्हें अस्पताल ले जाना मनमाना फैसला नहीं था. अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि वांगचुक किसी तरह की हिरासत में नहीं हैं और उनकी शारीरिक स्वायत्तता (बॉडी ऑटोनॉमी) का उल्लंघन नहीं हुआ है.
पत्नी ने निजी अस्पताल में शिफ्ट करने की मांग की
यह आदेश वांगचुक की पत्नी गीतांजलि आंगमो की याचिका पर आया, जिसमें उन्होंने सफदरजंग अस्पताल से मेडांटा अस्पताल में शिफ्ट करने की मांग की थी. उनका कहना था कि उन्हें सरकारी अस्पताल पर भरोसा नहीं रहा और वांगचुक को अपनी पसंद के अस्पताल में इलाज कराने का अधिकार मिलना चाहिए.
हाई कोर्ट ने केंद्र सरकार, दिल्ली पुलिस और सफदरजंग अस्पताल को नोटिस जारी कर तीन दिन के भीतर जवाब दाखिल करने को कहा है. मामले की अगली सुनवाई गुरुवार को होगी. हालांकि फिलहाल कोई अंतरिम राहत नहीं दी गई.
कोर्ट बोला- सरकार का फैसला मनमाना नहीं
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने कहा कि वांगचुक करीब 17-18 दिनों से भूख हड़ताल पर थे और उनकी स्वास्थ्य स्थिति चिंताजनक हो गई थी. मेडिकल रिपोर्ट में ब्लड शुगर और पोटैशियम का स्तर कम बताया गया था.
कोर्ट ने कहा कि सरकार ने स्वास्थ्य कारणों से उन्हें अस्पताल पहुंचाया, इसलिए इस कार्रवाई को मनमाना नहीं कहा जा सकता. अदालत ने यह भी माना कि हर व्यक्ति का जीवन मूल्यवान है और उसकी सुरक्षा सरकार की जिम्मेदारी है.
‘वांगचुक हिरासत में नहीं’
वांगचुक की ओर से वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने दलील दी कि बिना किसी हिरासत आदेश या आपराधिक मामले के सरकार किसी नागरिक को सरकारी अस्पताल में रखने के लिए मजबूर नहीं कर सकती.
इस पर कोर्ट ने कहा कि वांगचुक किसी भी तरह की हिरासत में नहीं हैं और वे स्वतंत्र नागरिक हैं. अदालत ने कहा कि उन्होंने स्वयं अस्पताल में भर्ती होने का फैसला नहीं लिया था, लेकिन उनकी गंभीर स्वास्थ्य स्थिति को देखते हुए सरकार उन्हें अस्पताल ले जाने की अधिकार रखती थी.
बॉडी ऑटोनॉमी का उल्लंघन नहीं
हाई कोर्ट ने यह भी कहा कि सफदरजंग अस्पताल के डॉक्टरों ने वांगचुक का इलाज उनकी सहमति से ही किया है. ऐसे में यह नहीं कहा जा सकता कि उनके साथ जबरदस्ती की गई या उनकी शारीरिक स्वायत्तता का उल्लंघन हुआ.
कोर्ट ने यह भी दर्ज किया कि वांगचुक के परिवार को सामान्य मरीजों की तुलना में अधिक मुलाकात की अनुमति दी गई. उनकी पत्नी किसी भी समय उनसे मिल सकती हैं और अन्य परिजनों को भी मिलने की छूट दी गई है.
मेडिकल रिपोर्ट पर उठा भरोसे का सवाल
गीतांजलि आंगमो ने कोर्ट में कहा कि अस्पताल की रिपोर्ट में पोटैशियम स्तर को लेकर विरोधाभास है. उनके अनुसार अस्पताल ने परिवार को 2.9 पोटैशियम स्तर बताया, जबकि बाद में स्वतंत्र लैब की जांच में यह 3.5 आया.
उन्होंने कहा कि इसी वजह से उनका अस्पताल पर भरोसा टूट गया और वे वांगचुक को मेडांटा अस्पताल ले जाना चाहती हैं. उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि अस्पताल में पुलिस की मौजूदगी के कारण परिवार सहज महसूस नहीं कर रहा.
सरकार ने कहा- अतिरिक्त सावधानी जरूरी
सरकार की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ने कहा कि वांगचुक की लंबी भूख हड़ताल और स्वास्थ्य स्थिति को देखते हुए सरकार को अतिरिक्त सतर्कता बरतनी पड़ रही है.
सफदरजंग अस्पताल के डॉक्टरों ने भी कोर्ट को बताया कि वांगचुक ने उन पर भरोसा नहीं जताया और कुछ जरूरी इलाज लेने से इनकार किया. सरकार ने कहा कि उनकी स्थिति को देखते हुए चिकित्सा टीम लगातार निगरानी कर रही है.
डॉक्टरों से सहयोग करने को कहा
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने कहा कि वांगचुक को डॉक्टरों के साथ सहयोग करना चाहिए ताकि जरूरत पड़ने पर चिकित्सा हस्तक्षेप किया जा सके. हालांकि अदालत ने स्पष्ट किया कि वह उन्हें किसी विशेष इलाज के लिए बाध्य नहीं कर रही है.
कोर्ट ने कहा कि वांगचुक की मेडिकल स्थिति से जुड़े सभी फैसले विशेषज्ञ डॉक्टरों की टीम मेडिकल प्रोटोकॉल के अनुसार करेगी.
फिलहाल नहीं मिली अंतरिम राहत
हाई कोर्ट ने फिलहाल वांगचुक को निजी अस्पताल में शिफ्ट करने का कोई अंतरिम आदेश देने से इनकार कर दिया. अदालत ने सरकार, पुलिस और अस्पताल से तीन दिन में जवाब मांगा है. मामले की अगली सुनवाई गुरुवार को होगी.


