उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्रों में पारंपरिक हुनर को रोजगार से जोड़ने की दिशा में ‘श्री तिमली हैंडलूम्स’ एक नई मिसाल बनकर उभर रहा है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के ‘वोकल फॉर लोकल’ और स्वरोजगार के संकल्प से प्रेरित यह पहल ग्रामीण महिलाओं को हथकरघा बुनाई का प्रशिक्षण देकर उन्हें आत्मनिर्भर बनाने के साथ उत्तराखंड की पारंपरिक कला को नई पहचान दिलाने का काम कर रही है।
महज सात महीने में बनी पहचान
‘श्री तिमली हैंडलूम्स’ की शुरुआत करीब सात महीने पहले हुई थी। इतने कम समय में यह पहल ग्रामीण क्षेत्र में महिला सशक्तीकरण और स्वरोजगार का उदाहरण बन गई है। यहां स्थानीय महिलाओं को पारंपरिक हथकरघा बुनाई की तकनीक का प्रशिक्षण देकर उनकी कला को आजीविका का माध्यम बनाया जा रहा है।
शिक्षा से आगे बढ़कर रोजगार की पहल
इस पहल के पीछे मेहा डबराल की सोच और मेहनत है। मेहा लंबे समय से पौड़ी गढ़वाल के दूरस्थ पर्वतीय क्षेत्रों के बच्चों के लिए निःशुल्क प्राथमिक विद्यालय चला रही हैं।
ग्रामीण परिवारों की आर्थिक स्थिति को करीब से समझने के बाद उन्होंने महसूस किया कि महिलाओं के पारंपरिक हुनर को रोजगार से जोड़ा जा सकता है। इसी सोच के साथ ‘श्री तिमली हैंडलूम्स’ की शुरुआत की गई।
12 महिलाओं को मिला हथकरघा प्रशिक्षण
इकाई के माध्यम से क्षेत्र की 12 ग्रामीण महिलाओं को हथकरघा बुनाई का व्यावसायिक प्रशिक्षण दिया गया। प्रशिक्षण लेने वाली महिलाओं में से छह ने इस काम को अपनी प्रमुख आजीविका के रूप में अपना लिया है।
इससे महिलाओं को अपने ही क्षेत्र में रोजगार का अवसर मिलने के साथ-साथ अपनी पारंपरिक कला को आगे बढ़ाने का मंच भी मिला है।
शिल्पी कार्ड से मिली औपचारिक पहचान
महिला शिल्पकारों को उनके हुनर की औपचारिक पहचान दिलाने के लिए उन्हें आर्टिसन कार्ड यानी शिल्पी कार्ड भी उपलब्ध कराए गए हैं। इसके जरिए महिलाएं सरकारी अवसरों, विभिन्न प्रदर्शनियों और मेलों से जुड़ सकती हैं।
साड़ी से शॉल तक तैयार हो रहे स्थानीय उत्पाद
‘श्री तिमली हैंडलूम्स’ में पारंपरिक बुनाई तकनीक को आधुनिक डिजाइन के साथ जोड़ा जा रहा है। यहां साड़ी, स्टोल, शॉल और मफलर सहित कई तरह के उत्पाद तैयार किए जा रहे हैं।
इन उत्पादों में उत्तराखंड की संस्कृति, पहाड़ी परंपराओं और स्थानीय हस्तकला की झलक दिखाई देती है।
पौड़ी से देश-दुनिया तक पहुंचाने की कोशिश
इकाई में तैयार होने वाले उत्पादों को केवल स्थानीय बाजार तक सीमित रखने के बजाय व्यापक बाजार उपलब्ध कराने का प्रयास किया जा रहा है। स्वयंसेवकों के नेटवर्क के माध्यम से इन हस्तनिर्मित उत्पादों को अंतरराष्ट्रीय बाजार तक पहुंचाने की दिशा में भी काम किया जा रहा है।
इससे ग्रामीण महिलाओं द्वारा तैयार किए जा रहे उत्पादों को नई पहचान मिलने के साथ उनके आत्मविश्वास में भी बढ़ोतरी हो रही है।
महिला सशक्तीकरण और पहाड़ी हुनर का संगम
‘श्री तिमली हैंडलूम्स’ की पहल यह दिखाती है कि पहाड़ की भौगोलिक चुनौतियों के बीच स्थानीय संसाधनों, पारंपरिक कला और महिला शक्ति को जोड़कर रोजगार के नए अवसर पैदा किए जा सकते हैं।
मेहा डबराल और उनकी टीम का यह प्रयास न केवल महिलाओं को आर्थिक रूप से मजबूत करने की दिशा में कदम है, बल्कि उत्तराखंड की पारंपरिक हथकरघा कला को संरक्षित करने और उसे नए बाजार से जोड़ने की कोशिश भी है।
पहाड़ का हुनर बनेगा आत्मनिर्भरता की ताकत
‘श्री तिमली हैंडलूम्स’ की कहानी इस बात की मिसाल है कि अगर स्थानीय हुनर को सही प्रशिक्षण, पहचान और बाजार मिले तो वही पारंपरिक कला ग्रामीण महिलाओं के लिए मजबूत आजीविका का जरिया बन सकती है।
यह पहल उत्तराखंड के स्थानीय उत्पादों को देश-दुनिया तक पहुंचाने और आत्मनिर्भर उत्तराखंड के संकल्प को जमीनी स्तर पर मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकती है।


