उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों में इन दिनों एक गंभीर और खौफनाक स्थिति बनती जा रही है. प्रदेश के जंगल अब गुलदारों के लिए छोटे पड़ने लगे हैं. एक हालिया शोध में चौंकाने वाला खुलासा हुआ है कि जिन जंगलों में करीब 500 गुलदारों के रहने की क्षमता है, वहां अब 2,275 गुलदार मौजूद हैं.
जगह की इस कमी ने न केवल इंसानों के लिए खतरा बढ़ाया है, बल्कि वन्यजीवों के बीच आपसी संघर्ष को भी चरम पर पहुंचा दिया है.
क्या कहते हैं अध्ययन
गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय के विशेषज्ञों द्वारा किए गए इस अध्ययन के अनुसार, एक वयस्क गुलदार को अपने जीवन और शिकार के लिए 30 से 50 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र की आवश्यकता होती है. वहीं उत्तराखंड का कुल वन क्षेत्र 24,686 वर्ग किलोमीटर है. इस आधार पर राज्य के जंगल अधिकतम 500 गुलदारों का ही भार उठा सकते हैं.
इसका मतलब है कि लगभग 1,775 गुलदार ऐसे हैं जिनके पास अपना कोई स्थायी क्षेत्र नहीं है. यही ‘बेघर’ गुलदार अब भोजन की तलाश में रिहायशी इलाकों और खेतों की ओर रुख कर रहे हैं, जिससे मानव-वन्यजीव संघर्ष तेजी से बढ़ रहा है.
3,940 गांव हुए खाली
शोध में यह भी सामने आया है कि प्रदेश के 3,940 गांव पूरी तरह खाली हो चुके हैं. इन खाली गांवों के खेत अब बंजर होकर जंगल में बदल रहे हैं, जहां लैंटाना जैसी झाड़ियां तेजी से फैल रही हैं. यह स्थिति जंगली जानवरों के छिपने के लिए अनुकूल वातावरण तैयार कर रही है.
हर साल औसतन तीन लोगों की मौत
मानव-वन्यजीव संघर्ष के आंकड़े भी चिंता बढ़ाने वाले हैं. टिहरी में किए गए सर्वे के अनुसार, पिछले 10 वर्षों में गुलदार के हमलों में हर साल औसतन तीन लोगों की मौत हुई और सात लोग घायल हुए. वहीं 2021 और 2022 में गुलदारों ने 172 पालतू पशुओं को भी शिकार बनाया.
पौड़ी गढ़वाल में स्थिति और भी गंभीर है. वर्ष 2025 में 15 से अधिक लोगों की मौत गुलदार के हमलों में हो चुकी है, जबकि पिछले पांच वर्षों में 27 लोग अपनी जान गंवा चुके हैं.
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले समय में यह संकट और गहरा सकता है.


