मद्रास हाईकोर्ट ने सोमवार को तमिलनाडु सरकार के उस फैसले को रद्द कर दिया, जिसमें पिछले साल करूर में हुई भगदड़ में जान गंवाने वाले 41 लोगों के परिजनों को सरकारी नौकरी देने का आदेश जारी किया गया था. अदालत ने कहा कि मानवीय आधार पर लिया गया कोई भी सरकारी फैसला संविधान के प्रावधानों से ऊपर नहीं हो सकता.
हाईकोर्ट ने क्या कहा?
जस्टिस सी.वी. कार्तिकेयन और जस्टिस आर. शक्तिवेल की डिवीजन बेंच ने कहा कि सरकारी नौकरियां संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 के तहत समानता और समान अवसर के सिद्धांतों के अनुसार दी जानी चाहिए. अदालत ने स्पष्ट किया कि सार्वजनिक रोजगार किसी विशेष वर्ग को सीधे नहीं दिया जा सकता.
बेंच ने टिप्पणी करते हुए कहा कि सरकारी नौकरियां “बांटने की चीज नहीं हैं”, बल्कि संवैधानिक प्रक्रिया के तहत योग्य उम्मीदवारों को मिलनी चाहिए.
पहले दी थी अंतरिम राहत
करीब तीन सप्ताह पहले इसी बेंच ने तमिलगा वेत्री कझगम (TVK) सरकार को पीड़ित परिवारों को नियुक्ति पत्र देने की अस्थायी अनुमति दी थी. हालांकि अदालत ने साफ कहा था कि ये नियुक्तियां अंतिम फैसले के अधीन रहेंगी और लाभार्थियों को पहली सैलरी मिलने से पहले मामले का अंतिम निपटारा किया जाएगा.
अब विस्तृत सुनवाई के बाद अदालत ने इन नियुक्तियों को असंवैधानिक बताते हुए रद्द कर दिया.
कार्यपालिका की शक्ति की भी सीमा है
राज्य सरकार ने अपने फैसले को संविधान के अनुच्छेद 162 के तहत कार्यपालिका के अधिकारों के आधार पर सही ठहराया था. लेकिन हाईकोर्ट ने कहा कि कार्यपालिका के अधिकार भी संविधान की सीमाओं के भीतर ही लागू किए जा सकते हैं.
अदालत ने कहा कि यदि कार्यपालिका को बिना किसी संवैधानिक सीमा के फैसले लेने की छूट दी जाए तो व्यवस्था में अराजकता फैल सकती है.
दया नियुक्ति का पहले से बना है नियम
हाईकोर्ट ने कहा कि सरकारी कर्मचारियों की सेवा के दौरान मृत्यु होने पर उनके परिजनों को दया नियुक्ति देने के लिए पहले से निर्धारित नियम और प्रतीक्षा सूची मौजूद है. ऐसे में करूर भगदड़ पीड़ितों के लिए अलग व्यवस्था बनाना उन लोगों के साथ अन्याय होगा, जो पहले से इस प्रक्रिया का इंतजार कर रहे हैं.
अन्य हादसों में भी उठेंगी ऐसी मांगें
अदालत ने कहा कि यदि इस मामले में सरकारी नौकरी देने की अनुमति दी जाती है तो भविष्य में औद्योगिक दुर्घटनाओं, पटाखा फैक्ट्री विस्फोट, सड़क हादसों और अन्य घटनाओं में भी इसी तरह की मांगें उठेंगी. इससे सरकारी भर्ती की पूरी व्यवस्था प्रभावित हो सकती है.
सरकार को दिया वैकल्पिक सुझाव
हाईकोर्ट ने कहा कि सरकार चाहती तो प्रभावित परिवारों की मदद तकनीकी शिक्षा, कौशल विकास, प्रोफेशनल ट्रेनिंग और उद्यमिता को बढ़ावा देकर भी कर सकती थी. इससे परिवार आत्मनिर्भर बनते और लंबे समय तक उनका भविष्य सुरक्षित रहता.
याचिका में क्या कहा गया था?
यह मामला मदुरै के वकील थीरन तिरुमुरुगन द्वारा दायर जनहित याचिका से जुड़ा था. याचिका में कहा गया था कि दया नियुक्ति के लिए पहले से कानूनी व्यवस्था मौजूद है और करूर भगदड़ का मामला उन श्रेणियों में नहीं आता, जहां सीधे सरकारी नौकरी दी जा सके.
याचिकाकर्ता ने यह भी दलील दी कि पहले हुई बड़ी दुर्घटनाओं में पीड़ित परिवारों को आर्थिक सहायता दी गई थी, लेकिन सरकारी नौकरी नहीं दी गई. इसलिए नई श्रेणी बनाकर नियुक्तियां देना संविधान के समानता के सिद्धांत का उल्लंघन है.
सरकार ने किया था बचाव
सुनवाई के दौरान एडवोकेट जनरल विजय नारायण ने सरकार का पक्ष रखते हुए कहा कि यह फैसला एक असाधारण मानवीय परिस्थिति को देखते हुए लिया गया था. उनका कहना था कि हादसे में अपने परिवार के कमाने वाले सदस्य को खो चुके लोगों के पुनर्वास के लिए सिर्फ आर्थिक सहायता पर्याप्त नहीं थी.
हालांकि हाईकोर्ट सरकार की इन दलीलों से सहमत नहीं हुआ.
क्यों अलग माना गया यह मामला?
अदालत ने कहा कि करूर भगदड़ की तुलना तूतीकोरिन पुलिस फायरिंग जैसे मामलों से नहीं की जा सकती. उन मामलों में सरकारी कार्रवाई के कारण लोगों की मौत हुई थी, जबकि करूर हादसे में ऐसी स्थिति नहीं थी. इसलिए सरकारी नौकरी देने का संवैधानिक आधार नहीं बनता.
अंतरिम नियुक्तियों का भी किया जिक्र
हाईकोर्ट ने माना कि जिन लोगों को नियुक्ति पत्र दिए गए थे, उन्हें अंतिम निर्णय से पहले अलग से नहीं सुना गया. लेकिन अदालत ने याद दिलाया कि अंतरिम आदेश में पहले ही स्पष्ट कर दिया गया था कि ये नियुक्तियां अस्थायी होंगी और अंतिम न्यायिक फैसले पर निर्भर करेंगी.


