इलाहाबाद हाईकोर्ट ने तलाक से जुड़े एक मामले में अहम फैसला सुनाया है. कोर्ट ने कहा कि पति पर अपनी 68 वर्षीय विधवा मां को छोड़कर अलग रहने का लगातार दबाव बनाना मानसिक क्रूरता माना जा सकता है. इसी आधार पर हाईकोर्ट ने पति की तलाक याचिका स्वीकार करते हुए निचली अदालत के फैसले को पलट दिया. यह मामला उत्तर प्रदेश के मैनपुरी का है, जहां पति ने पत्नी पर अपनी बुजुर्ग मां को छोड़कर उसके मायके में रहने का दबाव बनाने का आरोप लगाया था.
क्या है पूरा मामला?
मैनपुरी के इस दंपती की शादी 17 फरवरी 2000 को हुई थी. दोनों की दो बेटियां हैं. पति के मुताबिक, उसकी पत्नी 2012 में मायके चली गई थी और 2015 में उसने उसके साथ रहने से इनकार कर दिया. पति का आरोप था कि पत्नी उस पर दबाव बना रही थी कि यदि उसे साथ रहना है तो वह अपनी 68 वर्षीय विधवा मां को छोड़कर इटावा स्थित उसके मायके में आकर रहने लगे.
पति अपने माता-पिता का इकलौता बेटा है और वह अपनी बुजुर्ग मां को अकेला नहीं छोड़ना चाहता था. इसी विवाद के चलते उसने 2017 में मैनपुरी की फैमिली कोर्ट में तलाक की याचिका दाखिल की थी. हालांकि, फैमिली कोर्ट ने 12 जुलाई 2017 को उसकी याचिका खारिज कर दी. इसके बाद पति ने इलाहाबाद हाईकोर्ट का रुख किया.
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने क्या कहा?
जस्टिस जे. जे. मुनीर और जस्टिस इंद्रजीत शुक्ला की खंडपीठ ने पति की अपील स्वीकार कर ली. अदालत ने अपने 21 सितंबर के आदेश में कहा कि पति को अपनी 68 वर्षीय विधवा मां को छोड़ने के लिए मजबूर करना मानसिक क्रूरता के दायरे में आ सकता है.
कोर्ट ने कहा कि पति की ओर से लगाए गए आरोपों और उनके समर्थन में पेश किए गए सबूतों को पत्नी की ओर से जिरह के जरिए चुनौती नहीं दी गई. ऐसे में उन तथ्यों और सबूतों पर अविश्वास करने का कोई उचित कारण नहीं था.
अदालत के मुताबिक, पत्नी की ओर से पति पर अपनी बुजुर्ग मां से अलग रहने का दबाव डालना, खासकर मां की उम्र के इस पड़ाव पर, क्रूर व्यवहार माना जा सकता है.
पत्नी की मां और भाई की गवाही भी रही अहम
हाईकोर्ट ने मामले की सुनवाई के दौरान गवाहों के बयानों पर भी गौर किया. पत्नी की मां और भाई की गवाही से यह बात सामने आई कि पत्नी लंबे समय से अपने पति से अलग रह रही थी और पति पर अपनी बुजुर्ग मां को छोड़ने का दबाव बनाया जा रहा था.
अदालत ने कहा कि इन गवाहियों को भी जिरह के जरिए चुनौती नहीं दी गई थी. उपलब्ध सबूतों और गवाहों के बयानों के आधार पर कोर्ट इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि पति मानसिक क्रूरता साबित करने में सफल रहा है.
हाईकोर्ट ने यह भी माना कि ऐसी परिस्थितियों में पति की तलाक याचिका खारिज कर देना उचित नहीं होता, क्योंकि इससे दोनों पक्षों के हितों का समाधान नहीं हो पाता.
पत्नी को स्थायी गुजारा भत्ता मांगने का अधिकार
तलाक की याचिका स्वीकार करते हुए हाईकोर्ट ने पत्नी के आर्थिक अधिकारों का भी ध्यान रखा. अदालत ने स्पष्ट किया कि पत्नी हिंदू विवाह अधिनियम के तहत उचित आवेदन दाखिल करके पति से स्थायी गुजारा भत्ता यानी परमानेंट एलिमनी की मांग कर सकती है.
इस तरह हाईकोर्ट ने पति की अपील स्वीकार करते हुए फैमिली कोर्ट के पुराने फैसले को पलट दिया. इस मामले में अदालत ने स्पष्ट किया कि बुजुर्ग माता-पिता को छोड़ने के लिए जीवनसाथी पर लगातार दबाव डालना, परिस्थितियों और उपलब्ध सबूतों के आधार पर, मानसिक क्रूरता का आधार बन सकता है.


