अगर कोई आपसे कहे कि आज का दिन 24 घंटे से थोड़ा छोटा था, तो शायद आपको यकीन न हो. लेकिन वैज्ञानिकों के मुताबिक ऐसा होना बिल्कुल संभव है. कई बार धरती अपनी धुरी पर सामान्य से कुछ मिलीसेकंड पहले या बाद में एक चक्कर पूरा कर लेती है. यह अंतर इतना छोटा होता है कि हमें महसूस नहीं होता, लेकिन दुनिया की सबसे सटीक घड़ियां इसे रिकॉर्ड कर लेती हैं.
ऐसे में सवाल उठता है कि क्या सच में दिन छोटे या लंबे हो रहे हैं? अगर हां, तो हमारी घड़ियां हमेशा सही समय कैसे दिखाती हैं? आइए आसान भाषा में समझते हैं.
क्या हर दिन एक जैसी रफ्तार से घूमती है धरती?
जवाब है- नहीं. आमतौर पर हम मानते हैं कि धरती हर दिन एक जैसी गति से घूमती है, लेकिन वास्तव में इसकी रफ्तार में हल्का बदलाव होता रहता है.
NASA और National Institute of Standards and Technology (NIST) के अनुसार समुद्र की लहरें, तेज हवाएं, चंद्रमा का गुरुत्वाकर्षण, बर्फ का पिघलना और धरती के भीतर होने वाली हलचल जैसी कई चीजें इसकी गति को प्रभावित करती हैं. इसी वजह से कोई दिन कुछ मिलीसेकंड छोटा हो सकता है, तो कोई थोड़ा लंबा.
फिर घड़ियां हमेशा सही समय कैसे बताती हैं?
दुनिया का आधिकारिक समय Atomic Clock के आधार पर तय किया जाता है. यह इतनी सटीक होती है कि करोड़ों वर्षों में भी मुश्किल से एक सेकंड की गलती करती है.
लेकिन धरती की रफ्तार बदलती रहती है, जबकि Atomic Clock की गति स्थिर रहती है. धीरे-धीरे दोनों के बीच थोड़ा अंतर आने लगता है.
क्या होता है Leap Second?
जब धरती के वास्तविक समय और Atomic Clock के समय के बीच अंतर तय सीमा तक पहुंच जाता है, तो वैज्ञानिक UTC (Coordinated Universal Time) में एक अतिरिक्त सेकंड जोड़ देते हैं. इसे Leap Second कहा जाता है.
इसका मकसद सिर्फ इतना होता है कि हमारी घड़ियां और धरती की वास्तविक गति के बीच बड़ा अंतर न बनने पाए.
क्या अब दिन लगातार छोटे हो रहे हैं?
हाल के वर्षों में वैज्ञानिकों ने कुछ ऐसे दिन रिकॉर्ड किए हैं, जब धरती ने सामान्य से थोड़ा जल्दी अपना चक्कर पूरा किया. यानी उन दिनों की लंबाई कुछ मिलीसेकंड कम रही.
हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि अब हर दिन छोटा ही होगा. NIST के मुताबिक, लंबे समय के हिसाब से देखें तो चंद्रमा के प्रभाव के कारण धरती की घूर्णन गति धीरे-धीरे कम हो रही है. यानी भविष्य में औसतन दिन लंबे होते जाएंगे.
क्या पहली बार घटाना पड़ सकता है एक सेकंड?
अब तक जरूरत पड़ने पर UTC में हमेशा एक सेकंड जोड़ा गया है. लेकिन अगर आने वाले वर्षों में धरती लगातार तेज घूमती रही, तो पहली बार Negative Leap Second लागू करना पड़ सकता है. यानी समय में एक सेकंड घटाया जा सकता है.
इस संभावना पर International Earth Rotation and Reference Systems Service (IERS) लगातार नजर बनाए हुए है. हालांकि अब तक ऐसा कभी नहीं हुआ है.
हमारी जिंदगी पर क्या असर पड़ेगा?
कुछ मिलीसेकंड का फर्क इंसान महसूस नहीं कर सकता. आपकी घड़ी 24 घंटे ही दिखाएगी और आपकी दिनचर्या भी नहीं बदलेगी.
लेकिन GPS, Google Maps, सैटेलाइट, इंटरनेट, मोबाइल नेटवर्क, ऑनलाइन बैंकिंग और शेयर बाजार जैसी तकनीकों के लिए हर सेकंड बेहद अहम होता है. अगर इन सिस्टम्स का समय सही तरीके से सिंक न हो, तो तकनीकी समस्याएं पैदा हो सकती हैं.
यही वजह है कि दुनिया की टाइमकीपिंग एजेंसियां धरती की रफ्तार पर लगातार नजर रखती हैं, ताकि हमारी रोजमर्रा की तकनीक बिना किसी रुकावट के काम करती रहे.


