सियासी गलियारों में मंगलवार सुबह सबकी नजर सपा के तीसरे राज्यसभा उम्मीदवार के नाम पर थी, लेकिन सपा मुखिया अखिलेश यादव के एक पोस्ट ने तस्वीर साफ कर दी. उन्होंने लिखा, ‘अब हमारी निगाह तीन पर नहीं, चार सौ तीन पर है.’ माना जा रहा है कि इस बयान के जरिए अखिलेश ने तीसरे उम्मीदवार की रेस से पीछे हटने का संकेत दिया. इसके साथ ही राज्यसभा चुनाव में बिना मुकाबले नतीजे तय होने का रास्ता भी साफ हो गया.
सवाल यह है कि बीजेपी और उसके सहयोगी दलों में सेंध लगाकर तीसरी सीट का गणित साधने की रणनीति बनाने वाली सपा ने आखिर अपने कदम क्यों पीछे खींच लिए?
दो सीटें पक्की, तीसरी के लिए 27 वोट का गणित
विधायकों की संख्या के हिसाब से सपा की दो राज्यसभा सीटें लगभग तय थीं. तीसरी सीट के लिए पार्टी के पास तकनीकी तौर पर करीब 27 वोट बच रहे थे. ऐसे में माना जा रहा था कि सपा तीसरे उम्मीदवार के जरिए अपने वोटरों को भागीदारी का संदेश देने की कोशिश करेगी.
पहली दो सीटों पर पार्टी के स्थापित चेहरों और तीसरी सीट पर किसी सक्षम उम्मीदवार को उतारने की चर्चा थी. लेकिन टिकट के ऐलान के साथ ही सपा नेतृत्व ने कई समीकरण बदल दिए. रामगोपाल यादव का नाम पहले से तय माना जा रहा था, जबकि दूसरे उम्मीदवार के तौर पर धनराज परिमल नाथवानी की एंट्री ने तीसरी सीट की संभावनाओं को काफी प्रभावित किया.
तीसरी सीट के साथ ‘गणित’ बिगड़ने का खतरा
राज्यसभा चुनाव में विधायक ही वोटर होते हैं और कुछ महीने बाद यही विधायक विधानसभा चुनाव में जनता के बीच जाएंगे. ऐसे में सपा के लिए अपने विधायकों को एकजुट रखना बेहद अहम था.
2020 और 2024 के राज्यसभा चुनाव के अनुभवों को देखते हुए पार्टी अपने प्रमुख उम्मीदवारों की सीट जोखिम में डालने का खतरा नहीं उठा सकती थी. सपा के खाते में भले ही 101 विधायक बताए जाते हों, लेकिन इनमें से कुछ विधायक 2024 में बीजेपी के खेमे में चले गए थे.
इसलिए सपा ने चुना ‘त्याग’ का रास्ता
सपा के एक विधायक रमाकांत यादव जेल में हैं. हालांकि अखिलेश यादव ने उनके लिए वापसी का रास्ता खुला रखने की बात कही थी. वहीं, नामांकन की आखिरी तारीख से ठीक एक दिन पहले असंबद्ध विधायक राकेश प्रताप सिंह और अभय सिंह के साथ सपा विधायक विनोद चतुर्वेदी की मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से मुलाकात ने भी पार्टी की चिंता बढ़ा दी.
ऐसे में बीजेपी और उसके सहयोगी दलों में सेंधमारी की रणनीति के साथ-साथ अपने ही पाले से वोट खिसकने का खतरा भी बना हुआ था. खास बात यह रही कि तीसरे उम्मीदवार को लेकर अखिलेश यादव ने कभी स्पष्ट घोषणा नहीं की. वह संख्या पूरी होने और लंबी चुनावी प्रक्रिया जैसी बातों का ही जिक्र करते रहे.
यही वजह मानी जा रही है कि तीसरी सीट का गणित साधने की कोशिश कहीं पार्टी के अपने ही गणित को न बिगाड़ दे, इसलिए सपा ने मुकाबले में उतरने के बजाय ‘त्याग’ का रास्ता चुना.
तीसरा उम्मीदवार उतारना आसान नहीं था
सूत्रों के मुताबिक, हालिया राजनीतिक अनुभवों को देखते हुए सपा नेतृत्व को अंदाजा था कि तीसरी सीट जीतने के लिए बेहद मजबूत प्रबंधन की जरूरत होगी. इसके लिए ऐसे उम्मीदवार की आवश्यकता थी, जो संसाधनों के साथ-साथ विधायकों के बीच जरूरी तालमेल भी बना सके.
जिन नामों की चर्चा चल रही थी, वे इस कसौटी पर पूरी तरह फिट नहीं बैठ रहे थे. ऐसे में कमजोर दांव खेलने के बजाय पार्टी ने पीछे हटना ज्यादा सुरक्षित समझा.
नैरेटिव भी बनता मुश्किल
तीसरी सीट पर किसी पीडीए चेहरे या बीजेपी की घेराबंदी के लिए मजबूत राजनीतिक संदेश देने वाले उम्मीदवार को उतारना भी आसान नहीं था. जीत की संभावना कमजोर होने पर सवाल उठता कि अगर चेहरा इतना महत्वपूर्ण है तो उसे पार्टी की पहली या दूसरी प्राथमिकता क्यों नहीं बनाया गया?
ऐसे में सपा ने मौजूदा राजनीतिक कशमकश में उलझने के बजाय आगे की बड़ी लड़ाई पर फोकस करने का फैसला किया. अखिलेश यादव का ‘तीन पर नहीं, चार सौ तीन पर निगाह’ वाला बयान इसी रणनीति का संकेत माना जा रहा है. पार्टी का संदेश साफ है कि फिलहाल राज्यसभा की एक अतिरिक्त सीट से ज्यादा महत्वपूर्ण उसके लिए 403 विधानसभा सीटों की बड़ी लड़ाई है.


