उत्तर प्रदेश में मरीजों को दवाएं उचित कीमत पर उपलब्ध कराने और अस्पतालों में दवा की कीमत तय करने की प्रक्रिया को पारदर्शी बनाने की तैयारी शुरू हो गई है. यूपी एफएसडीए ने दवाओं की खरीद कीमत और मरीजों से वसूली जाने वाली कीमत के बीच बड़े अंतर को लेकर राष्ट्रीय स्तर पर हस्तक्षेप की मांग की है. इस संबंध में एफएसडीए आयुक्त डॉ. रोशन जैकब ने नेशनल फार्मास्यूटिकल प्राइसिंग अथॉरिटी (NPPA) को पत्र भेजा है.
कुछ मामलों में 67 गुना तक मिला अंतर
यूपी एफएसडीए की ओर से प्रदेश के प्रमुख शहरों में स्थित 22 मेडिकल कॉलेजों और 30 सरकारी एवं निजी अस्पतालों की 200 से ज्यादा फार्मेसियों का निरीक्षण किया गया. इस दौरान दवाओं, मेडिकल कंज्यूमेबल्स, मेडिकल डिवाइस और न्यूट्रास्यूटिकल्स की अस्पताल की खरीद कीमत यानी प्राइस टू रिटेलर (PTR) और मरीज से वसूली जाने वाली कीमत के बीच बड़ा अंतर सामने आया.
कुछ मामलों में खरीद कीमत और मरीज से ली जाने वाली कीमत के बीच यह अंतर 67 गुना तक पाया गया. इसके बाद एफएसडीए ने NPPA से इस मामले में प्रभावी नियामकीय कार्रवाई की मांग की है.
1 नवंबर से अस्पतालों में कीमतें होंगी सार्वजनिक
दवा की कीमतों में पारदर्शिता बढ़ाने के लिए अस्पताल फार्मेसियों में दवाओं की खरीद और बिक्री कीमत को सार्वजनिक करने का आदेश भी दिया गया है. यह व्यवस्था 1 नवंबर से लागू की जाएगी.
इसका उद्देश्य मरीजों को यह जानकारी उपलब्ध कराना है कि अस्पताल ने संबंधित दवा या मेडिकल उत्पाद किस कीमत पर खरीदा और उसे किस कीमत पर मरीज को दिया जा रहा है.
मरीजों तक पहुंचे खरीद में मिली छूट का फायदा
एफएसडीए का मुख्य सवाल यह है कि अगर कोई अस्पताल निर्माता या सप्लायर से किसी दवा को भारी छूट पर खरीदता है, तो उस छूट का फायदा मरीजों को कितना मिलता है.
वर्तमान व्यवस्था में दवा की पैकेजिंग पर MRP दर्ज होती है. वहीं अस्पतालों की संस्थागत खरीद में अक्सर ज्यादा छूट के आधार पर सौदे किए जाते हैं. ऐसे में अस्पताल की वास्तविक खरीद कीमत और मरीज से वसूली जाने वाली कीमत के बीच कितना अंतर है, इसकी जानकारी मरीज को आसानी से नहीं मिल पाती.
सरकारी मेडिकल कॉलेजों के ‘कॉस्ट प्लस’ मॉडल
यूपी एफएसडीए ने NPPA को सरकारी मेडिकल कॉलेजों में अपनाए जा रहे ‘कॉस्ट प्लस’ मॉडल का उदाहरण भी दिया है. खासतौर पर महंगे इंजेक्शन, हाई-एंड एंटीबायोटिक्स और कैंसर की दवाओं में इस मॉडल के जरिए मरीजों को संस्थागत खरीद का लाभ देने की व्यवस्था का उल्लेख किया गया है.
इस मॉडल में केवल दवा की पैकेजिंग पर दर्ज MRP को आधार बनाने के बजाय अस्पताल की वास्तविक खरीद लागत को ध्यान में रखते हुए मरीज से ली जाने वाली कीमत तय करने का प्रयास किया जाता है.
एक ही ब्रांड की अलग-अलग MRP पर भी सवाल
एफएसडीए ने एक ही ब्रांड की दवाओं पर अलग-अलग MRP होने के मुद्दे पर भी चिंता जताई है. विभाग का मानना है कि दवाओं की खरीद कीमत, MRP और मरीज से वसूली जाने वाली कीमत के बीच पारदर्शिता बढ़ने से मरीजों को वास्तविक कीमत की जानकारी मिल सकेगी.


